बचपन से सामान्य ज्ञान की पुस्तक में पढ़ते आये थे कि दुनिया का सबसे छोटा देश है “वेटिकेन सिटी ” तब लगता था छोटे से किसी द्वीप या पहाड़ी पर छोटा सा देश होगा.पर ये कभी नहीं सोचा था कि एक देश के अन्दर क्या बल्कि एक शहर के अन्दर ही ये अलग देश है.करीब ४४ हेक्टेयर में बना हुआ कुल ८०० लोगों की आबादी वाले इस देश का अपना राजा है, इसकी राजभाषा है लातिनी । ईसाई धर्म के प्रमुख साम्प्रदाय रोमन कैथोलोक चर्च का यही केन्द्र है, इस साम्प्रदाय के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप का यही निवास स्थान है और उन्हीं की यहाँ सत्ता है, अपने अलग कानून हैं.यहाँ तक कि अपना अलग रेडियो स्टेशन, अपनी अलग मुद्रा है और अपना अलग पोस्ट ऑफिस भी. जो अपनी डाक टिकट तक अलग बनाते हैं.यहाँ तक कि ज्यादातर रोम वासियों द्वारा इटालियन डाक सेवाकी जगह वेटिकन डाक सेवा इस्तेमाल की जाती है क्योंकि ये ज्यादा तेज़ है..वेटिकेन सिटी अपने खुद के पासपोर्ट भी जारी करती है जिसे पोप, पादरियों ,कार्डिनल्स और स्विस गार्ड के सदस्यों ( जो इस देश में मिलिट्री फ़ोर्स की तरह काम करते हैं) को दिए जाते हैं.और इतना सब होने पर भी यह कोई अलग देश नहीं लगता .रोम के अन्दर ही बस एक अलग सा केंद्र लगता है एक वृहद और बेहद खूबसूरत प्रतिमाओं से सजा एक कैम्पस.

जिस दिन हम वेटिकेन सिटी पहुंचे, रविवार था. और वहां खास प्रार्थना का आयोजन था जिसमें हिस्सा लेने के लिए महँगी टिकट के वावजूद लम्बी लाइन थी. अन्यथा चर्च में आम लोगों का प्रवेष निषेध था .परन्तु म्यूजियम खुला हुआ था. हममे से किसी को भी ना तो धर्म में, ना ही प्रार्थना में इतनी रूचि थी कि महँगी टिकट लेकर २ घंटे की लाइन में लगते अत: फैसला हुआ कि यहाँ दोपहर का खाना त्याग कर लाइन में लगने से बेहतर है कि म्यूज़ियम देखकर ही निकल लिया जाये और बाकी का दिन रोम की बाकी जगह देखने में बिताया जाये.तो हम भव्य प्रतिमाओं को निहारते हुए और बाहर खड़े गार्ड्स के साथ तस्वीरें
खिचवाते हुए म्यूजियम में पधारे जहाँ की भव्यता देख कर पहली बार एहसास हुआ कि वाकई किसी अमीर राज- घराने में आ पहुंचे हैं.खैर म्यूजियम तो बहुत ही बड़ा था पर उसका छोटा सा चक्कर लगा कर हम निकल आये और सोचा कि अब कुछ खाने का जुगाड़ किया जाये.

पिछले कुछ दिनों से इटली के अलग अलग शहरों में घूमते हुए पिज्जा, पास्ता और पनिनी ही खा रहे थे. अब चूँकि राजधानी रोम में थे और अब हम रोम की मुख्य सड़क पर खड़े थे, माहौल कुछ कुछ अपने देश जैसा ही लग रहा था. अत: एक आशा हुई कि शायद कोई दाल रोटी वाला भारतीय भोजनालय मिल जाये.परन्तु हमारा ये कयास भी गलत साबित हुआ. इटली में उनका ही भोजन इतना प्रसिद्ध है कि किसी और देश के व्यंजनों की शायद गुंजाइश ही नहीं.हाँ कुछ एक चीनी रेस्टोरेंट्स जरुर दिखाई दिए पर भारतीय के नाम पर एक -दो बांग्लादेशियों के रेस्टोरेंट्स ही नजर आये जहाँ अपनी किस्मत अजमाने से अच्छा हमने और एक दिन पिज्जा पर बिताना ही बेहतर समझा.या फिर क्यों ना उन खास

सजावटी बेहद खूबसूरत आइस क्रीम पर हाथ अजमाया जाये जिनकी म्यूजियम जैसी दुकाने उस सड़क के हर कोने में उसी तरह दिखाई पढ़ रही थीं जैसे इटालियन ब्रांड और डिजाइनर सामानों के छोटे- बड़े शो रूम्स.शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो उनके आकर्षण से अछूता रहता हो.दुनिया भर के जितने फ्लेवर आप सोच सकते हो आपको वहां मिल जाते हैं.औरे वहां टहल रहे हर यात्री के हाथ में एक खूबसूरत कोन दिखाई पढ़ जाता है.खैर कीवी,रम,वाइल्ड बैरी, मेलन, जैसे अलग अलग फ्लेवर की आइसक्रीम लेकर हम पहुंचे कुछ ऐसी विचित्र सी सीढ़ियों पर जिन्हें यूरोप की सबसे व्यापक सीढियां कहा जाता है.ये नीचे “पिआजा दे स्पंगा” से ऊपर चर्च “त्रिनिता दे मोंटी को जोड़ती हैं. क्योंकि इन्हें स्पेन की एम्बेसी को चर्च से जोड़ने के लिए बनाया गया था इसलिए शायद इसका नाम स्पेनिश स्टेप्स है.एकदम खड़ी चढ़ाई पर चढ़ती हुई इन १३८ सीढ़ियों को एक फ़्रांसिसी राजनयिक ने विरासत में मिले धन से बनवाया था.खैर स्वादिष्ट आइस क्रीम से मिली ऊर्जा को ३२ डिग्री की गर्मी में इन सीढ़ियों पर चढ़कर एक चर्च को देखने में गवाने का हमारा मन ना हुआ और हमने वहां से कूच किया कुछ दुकानों की तरफ

कि आखिर इटली आयें और कुछ गुच्ची या अरमानी जैसे ब्रांड की चीजें ना लीं तो क्या खाक इटली आये? परन्तु ये नाम सिर्फ नाम के बड़े ही नहीं दाम के भी बड़े हैं. और शायद इटली की दुकानों से सस्ते लन्दन की दुकानों में मिल जाते हैं. अत: उन्हें सिर्फ निहार कर कुछ निराश से जब हम बाहर सड़क पर निकले तो एक बार फिर हमारे निराशा में डूबे मन को उबारा कुछ अपने ही तरह के लोगों ने. उन बांग्लादेशियों ने जो वहां सड़क पर ही एक चादर पर सभी प्रसिद्ध इटालियन ब्रांड का सामान लगाये बेच रहे थे. वो भी कौड़ियों के दाम और बिलकुल अपने देशी स्टाइल में. जैसे ही किसी पुलिस वाले को देखते, तुरंत सभी सामान चादर में लपेट ऐसे घूमने लगते जैसे कोई पर्यटक ही हों. उनके जाते ही फिर से अपना बाजार लगा लेते और ग्राहकों को पटाने लगते. हालाँकि वह सामान हमें दिल्ली के पालिका बाजार जैसा ही लगा परन्तु दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ब्रांड अच्छा है. की तर्ज़ पर हमने भी कुछ खरीद लिया और पहुंचे

रोम के सुप्रसिद्ध त्रेवी फाउन्टेन पर.
२६ मीटर उंचा और २० मीटर चौड़ा ये रोम का सबसे ब
ड़ा और दुनिया का सबसे प्रसिद्ध फव्वारा है.फव्वारे में जो प्रतिमा है वह सागर के देवता नेपच्यून की है. जो सीपी और २ समुद्री घोड़ों के रथ पर सवार हैं.इनमें से एक घोड़ा शांत और आज्ञा कारी है और दूसरा अशांत. जो कि सागर के मूड को दर्शाते हैं.यह फव्वारा रोम वासियों के पीने के पानी की आपूर्ति के लिए बनाया गया था परन्तु अब इसे चखने की कोशिश भी नहीं कीजियेगा क्योंकि अब यह पानी सलोरीन और अन्य रासायनिक पदार्थों का सागर है.इस फव्वारे के बारे में एक किवदंती भी प्रचलित है कि जो इसमें सिक्का डालता है वह दुबारा रोम जरुर आता है. रोम अभी काफी देखना बाकी था परन्तु समय अभाव ने हमें भी उस फव्वारे में एक सिक्का डालने पर मजबूर कर दिया इस आशा में कि किवदंतिया भी किसी ना किसी आधार पर ही बनती होंगी.शायद इस सिक्के के बहाने हमारा दुबारा रोम आना संभव हो ही जाये. इसी आशा के साथ हमने एक सिक्का आँख बंद करके उस इच्छाधारी फव्वारे में डाला और फ्लोरेंस के लिए निकल पड़े .