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इटली की राजधानी रोम – इस नाम से जूलियस सीजर नेरो जैसे कई नाम ज़ेहन में चक्कर लगाने लगते हैं.इतना कुछ है रोम में कि ना जाने कब से आपको इसकी यात्रा कराने के बारे में सोचा और हर बार यह सोच कर रुक गई कि कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ ख़तम. अब जब लिखने बैठी हूँ तो शायद कई किश्त लग जाएँ परन्तु मेरी कोशिश रहेगी कि इस ऐतिहासिक नगरी के साथ थोडा सा न्याय कर सकूँ. विश्व की प्राचीनतम सभ्यता में से एक रोम.अपने नाम के साथ ही इतिहास के पन्नो की तरफ ले जाता है.कुछ वर्ष पहले जब इटली जाने का कार्यक्रम बनाया तो सोचा था रोम के लिए कम से कम ४ दिन तो निकाले जायेंगे.मेरी तमन्ना रोम की एक-एक दिवार पर पडी इतिहास की हर एक लकीर पढ़ लेने की थी.परन्तु हमेशा ऐसा थोड़े ना होता है जैसा कि आप सोचें.परिवार में मेरे अलावा किसी को इतिहास में रूचि नहीं. तो पहले तो इटली जाने के लिए ही उन्हें ब्लैक मेल करना पडा.वेनिस और पीसा के नाम के ललकारे देने पड़े और चूँकि रोम इटली की राजधानी है इसलिए उसे भी देख लेने की मेहरबानी करने के लिए वे तैयार हो गए परन्तु शर्त यह कि वेनिस, मिलान,फ्लोरेंस और पीसा के बाद बचे हुए सिर्फ २ दिन में जितना हो सकेगा रोम घूमा जायेगा. उसपर तुर्रा यह कि और भला चर्च और खंडहरों को कब तक निहारोगी ? खैर भागते भूत की लंगोटी भली. ये सोच हम रोम देखने के सपने सजाने लगे. <span title= इस भव्य नगर की स्थापना लगभग 753 ईसा पूर्व में हुई थी। और इसके बसने को लेकर एक बहुत ही चर्चित कहानी भी है .कि मंगल देवता के दो जुड़वां पुत्र थे – रोमुलस और रिमस। एक बार तेबर नदी में बाढ़ आने से ये दोनों बहते हुए पेलेटाइन पहाड़ी के पास पहुंच गए। इन बच्चों को एक मादा भेडि़या ने दूध पिलाया व एक चरवाहे ने दोनों को पाला। बड़े होकर इन दोनों भाइयों ने एक नगर की स्थापना की जिसका नाम रोमुलस के नाम पर रोम रखा गया व रोमुलस इसके सम्राट बने। <span title= इटली पहुँचने के लिए लन्दन से हमारी उड़ान मिलान की थी और फिर वहां से वेनिस और वेनिस से रोम हमें योरोस्टार (ट्रेन ) से पहुंचना था.यूँ यह ट्रेन काफी सुविधाजनक थी परन्तु पूरी इटली में एक समस्या बहुत विकट है वह यह कि वहां बस में चढो या ट्रेन में सिर्फ टिकट लेने से काम नहीं चलेगा उसे वहां लगी कुछ मशीनों पर वैलिडेट (पंच )भी करना पड़ेगा. वर्ना वो टिकट कोई मायने नहीं रखती.खैर असली समस्या यह नहीं थी , परेशानी तो यह थी कि यह सब अगर आप पहले से नहीं जानते तो वहां जाकर आपको कोई बताने वाला नहीं मिलेगा और भाषा की अनभिज्ञताकी वजह से वहां कुछ लिखा आप पढ़ नहीं पाएंगे.और अगर आप टिकट बिना वैलिडेट कराये बस या ट्रेन में पहुँच गए तो आपको कह दिया जायेगा कि टिकट वैलिड नहीं है.और अगर आपकी किस्मत अच्छी है तो कोई आपको समझाने वाला मिल जायेगा कि आपको करना क्या है.लेकिन जब तक आप समझ कर टिकट वैलिड कराने जायेंगे आपकी बस या ट्रेन छूट जाएगी.या फिर आपको जुर्माना भी भरना पड़ सकता है.खैर इस मामले में हमारी किस्मत अच्छी थी और कुछ ऐसा होता है ये हम कहीं नेट पर पढ़ चुके थे तो एक ही बार के झटके में हमें समझ में बात आ गई और आगे से यह काम सबसे पहले याद रखा गया. खैर शाम को करीब पांच बजे हम रोम के ट्रेन स्टेशन पर पहुंचे.और वहां पहुँचते ही एहसास हुआ कि हमारे भारतीय मित्र कितनी अफवाह उड़ाते हैं उन्होंने हमें कहा था कि रोम और नई दिल्ली में कोई फरक नहीं है. परन्तु स्टेशन से बाहर निकलते ही उनकी बात का मर्म हमें समझ में आने लगा. वाकई भारत के ही किसी बड़े शहर के जैसा माहौल था.वही छोटे छोटे खोमचे, फुटपाथ पर ही चादर बिछा कर सामान बेचते लोग और अपनी -अपनी कम्पनियों के पैकेज बेचने को बेताब ट्यूरिस्ट गाइड.मोलभाव करते हमारे पीछे पीछे भाग रहे थे. फर्क था तो बस इतना कि वे सारे भारतीय की जगह बंगला देशी थे. हालाँकि देखने से तो सारे साउथ एशियन एक जैसे ही लगते हैं.पर हमें फ़िक्र थी अपने होटल पहुँचने की जो कि शहर से कुछ बाहर था और हमें वहां तक पहुँचाने के लिए एक बस आनेवाली थी जिसका कि बताई हुई जगह पर कोई अता पता नहीं था.और उस तक पहुँचने में हमें काफी मशक्कत करनी पडी . इन सब समस्यायों को देखते हुए.और रोम के दर्शनीय स्थलों की संख्या देखते हुए सर्वसम्मत्ति से ये फैसला हुआ कि २ दिन का बस टूर ले लिया जाये.इससे बेशक समय की थोड़ी पाबन्दी रहेगी परन्तु कम समय में काफी कुछ कवर किया जा सकेगा.अत: वहीं एक बंगाली भाई से २ दिन का टूर बुक करा के हमने होटल के लिए प्रस्थान किया. दूसरे दिन उसी स्टेशन से हमारी रोम यात्रा शुरू हुई और सबसे पहला पड़ाव आया कोलेजियम. रोमन आर्किटेक्चर और इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना। इसकानिर्माण तत्कालीन शासक वेस्पियन ने 70-72वीं ईस्वी में प्रारंभ किया था, जिसे उनके बाद सम्राट टाइटस ने 80 ईस्वी में पूरा किया। 81 से 96 के बीचडोमीशियन के राज में कुछ और परिवर्तन किए गए। इसका नाम सम्राट वेस्पियन और टाइटस के पारिवारिक नाम फ्लेवियस के कारण एम्फीथिएटरम्‌फ्लावियम रखा गया परन्तु वर्तमान में यह कोलेजियम के नाम से ही प्रसिद्ध है. हालाँकि इसके अब खंडहर ही शेष हैं परन्तु इन खंडहरों को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि इमारत कितनी विशालकाय और यहाँ होने वाली गतिविधियाँ कितनी भयावह रही होंगी. यहाँ योद्धा अपनी युद्ध कला का प्रदर्शन करते थे और यहाँ तक कि कई दिनों से भूखे रखे जंगली जानवरों से लड़कर उन्हें अपने कौशल का प्रदर्शन करना होता था.इन जानवरों को प्रतियोगिता स्थल तक लाने के लिए भूमिगत मार्ग का उपयोग किया जाता था.और फिर बुरी तरह से घायल और शहीद योद्धाओं को रखने की भी अलग व्यवस्था थी.कोलेजियम में घूमते हुए अक्सर ही लगता जैसे अभी उस द्वार से भूखे शेर निकल कर आयेंगे . वहां खड़े ज्यादातर दर्शकों के इस कल्पना मात्र से रौंगटे खड़े हो जाते थे. खैर वहां से राम राम करते बाहर निकले तो कुछ रोमन – “रोमन एंड कंट्री मेन” स्टाइल में(पारम्पारिक रोमन वेश भूषा) बाहर घूम रहे थे, और लोग उनके साथ तस्वीरें खिचवा रहे थे. जाहिर है ये मौका हम भी नहीं खोना चाहते थे तो उचक कर पहुँच गए और बत्तीसी निकाल कर खड़े हो गए. फोटो लिया गया और जैसे ही हम धन्यवाद कह कर हटे उसने हमें पकड़ लिया और बोला फीस निकालो. हमने कहा कहाँ लिखा है ? तो महाशय बोले ३० डिग्री की गर्मी में ये लबादा लादे हम यहाँ फिर रहे हैं पागल नहीं हैं. फोटो खिचवाने के पैसे हैं. वो देने पड़ेंगे .पर हम अड़ गए कि ऐसा कहीं लिखा नहीं है. और आपने पहले कहा भी नहीं था. इसलिए हम तो नहीं देंगे पर वो जोर जबरदस्ती पर उतर आया और कहने लगा कि फिर फोटो डिलीट करो हमने कहा ठीक है कर देते हैं और उसे फोटो डिलीट करके दिखा दी. अब वह अपनी जीत पर गर्व करता चला गया परन्तु उसे यह नहीं पता था कि उसका पाला हिन्दुस्तानियों से पडा था.जो उस ज़माने में ज्ञानी कहलाते थे. जिस ज़माने में उसके पूर्वजों को मुँह भी धोना नहीं आता था.असल में हमने उसे जो डिलीट करके दिखाया था वो वीडियो रेकॉर्डिंग था और उसके बाद का स्टिल फोटो हमारे कैमरे में सही सलामत था :). रोम में एक रोमन को चकमा देकर हम पहुंचे वहीं पास के एक महल में जहाँ के खंडहर में भी भव्यता और एश ओ आराम झलक रहा था.सभ्यता के आरम्भ में भी उस महल में प्रयोग होने वाला मार्बल किसी उच्च कोटि के मार्बल से ज्यादा अच्छा प्रतीत होता था. और यह सिद्ध भी कर दिया हमारे साथ की गाइड ने,वहीं एक जगह पर एक ग्लास पानी डाल कर. पानी पड़ते ही उस जगह एक धूल पड़े पत्थर की जगह बेहद खूबसूरत,रंगीन और चमकदार नजर आने लगा वैसे यहाँ यह कहना भी आवश्यक होगा भवन निर्माण हो या मूर्ति कला रोम की अपनी एक अलग ही पहचान है.जगह जगह लगे हुए स्टेचू इतनी सूक्ष्म मानवीय शारीरिक बनावट का नमूना हैं कि देखने वाला दांतों तले उंगली दबा लेता है.अभी तक मैंने भारत का कोणार्क हो या फ्रांस का लौर्व ज्यादातर जगह मूर्तियों,प्रतिमाओंया चित्रों में स्त्री को ही कलात्मक रूप में देखा था परन्तु रोम में ( पूरे इटली में ही ) इसके इतर पुरुष के नग्न स्टेचू दिखाई पढ़ते हैं जो वहाँ के मूर्तिकार की कारीगरी,मानवीर शरीर संरचना विज्ञान और उच्च कलात्मकता को बताते हैं. सुविनियर के तौर पर भी इसी तरह की मूर्तियों की वहां सर्वाधिक बिक्री होती देखी जातीहै. रास्ते में रोम की पुरातन दीवार और और बहुत से कलात्मक स्मारकों से गुजरते हुए हमारा अगला पड़ाव था वैटिकन सिटी. —क्रमश: