मेरे ख़याल से घुमक्कड़ी शौक या आदत नहीं बल्कि एक रोग है। एक ऐसा रोग जो लग गया तो लग गया फिर इससे छुटकारा नामुमकिन सा है। वक़्त के साथ इसकी गंभीरता कम बेशक हो जाये , या हो सकता है बाहर से यह रोग नजर न आये परन्तु अन्दर ही अन्दर सालता जरूर रहता है। अब इसे अपना सौभाग्य कहूँ या अपने – अपनों का दुर्भाग्य कि यह रोग मुझे बचपन से लगा हुआ है और इन तानो के वावजूद कि ” घूमने का नाम लो तो यह चिता से भी उठ खड़ी हो ”  इस रोग के निदान के लिए हर दूसरे – तीसरे महीने तो मुझे अपने शहर से दूर किसी जगह की डोज लेनी आवश्यक हो जाती है। 


अब ब्रिटेन में मौसम पर इतने चुटकुले ऐसे ही नहीं सुनाये जाते। “मौसम ” यहाँ का राष्ट्रीय मजाक है। और इस बार इंग्लैण्ड में मौसम का मजाक कुछ ज्यादा ही हो जाने के कारण कहीं दूर जाने की योजना तो बन नहीं पाई अंत में तय हुआ कि सप्ताहांत में कहीं आसपास ही टहल आया जाये। 

लन्दन की चलती पुर्जे सी जिन्दगी से दूर कहीं सुकून में कुछ घंटे बिताने के उद्देश्य से सोचा गया कि ” “कोट्स वोल्ड”  की सैर कर आया जाये।“कोट्स वोल्ड” ,  – लन्दन से करीब दो घंटे की ड्राइव पर, दक्षिण पश्चिमी और मध्य इंग्लैण्ड में स्थित, प्राकृतिक सुन्दरता से परिपूर्ण एक पहाड़ी इलाका है . करीब पच्चीस माइल में फैला हुआ और करीब नब्बे माइल लंबा यह पूरा क्षेत्र, ऑक्सफोर्ड शायर एवं ग्लुस्टर शायर समेत सात काउंटी से घिरा हुआ है। और इसमें छोटे छोटे कई एतिहासिक और पुरातन गाँव हैं, गाँवों के बीच से बहती हुई नदियाँ हैं, छोटे छोटे टीले से पहाड़ हैं जिन्हें काफी हद तक उसी रूप में संरक्षित करके रखा गया है।इनमें से  “ब्रौटन ऑन द वाटर”  और स्टरडफोर्ड  अपोन एवोन की सैर मैं आपको करवा चुकी हूँ अत: अब बाकी बचे गांवों में – बिबरी, चेल्तेंनहम, बरफोर्ड और उनके बीच रास्ते में जो भी मिले, उन गाँवों में घूम आने का प्लान बनाया गया। 

योजना तो हमने बना ली,मगर अभी एक बाधा बाकी थी। गाँव के नाम से बच्चों की ना – नुकर शुरू हो गई थी। माथे पर हाथ रखकर वो बुदबुदाने लगे थे कि पूरा एक दिन हम वहां करने क्या जा रहे हैं। आखिर कितनी देर प्राकृतिक सुन्दरता निहारेंगे। उनकी आँखें तो अभी ठीक हैं, ज्यादा बिटामिन G” (ग्रीनरी) की उन्हें जरूरत नहीं है। अब उनके सड़े हुए बूथों के साथ जाना तो संभव नहीं था अत: समझौता किया गया कि पहले एक दिन वे हमारे साथ गाँव घूमेंगे और दुसरे दिन हम उनके साथ उनके पसंद की जगह। तब जाकर बात बनी। अब बच्चों की पसंद की जगह क्या थी वह सब बाद में, पहले बात गाँव की।

हालाँकि इन गाँवों में ऐसा कुछ भी नहीं जो भारतीय दृष्टि से गाँव की परिभाषा पर ठीक बैठता हो। (यह भी मैं सुनी सुनाई बातों और टी वी फिल्मो में देखे गाँवों के आधार पर कह रही हूँ, क्योंकि आजतक मैंने  कोई भी भारतीय गाँव नहीं देखा है, और इसी को मैं अपने गाँव के प्रति अपार आकर्षण का कारण मान लेती हूँ ) न गोबर से लिपे पुते घर, न बुनियादी सुविधाओं की कमी और न ही सडकों पर घूमती या घरों में पाली गईं गाय, भैंसे। परन्तु फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो लन्दन जैसे शहर से इन्हें अलग करता है। मकानों की पुरातन वास्तुकला, खाने पीने के लिए मैकडोनल्स या के ऍफ़ सी जैसी चेन्स के बदले पुराने तरह के कैफे और उनमें परोसे जाने वाले परंपरागत फिश एंड चिप्स जैसे अंग्रेजी पकवान. शांत, सुन्दर , छोटी छोटी सड़कें, सभ्य सरल मित्रवत नागरिक और सबसे बड़ी बात शहरों से इतर वाहन पार्किंग की कोई समस्या नहीं, कोई यमराज रुपी पार्किंग हवलदार यहाँ वहां घूमता / घूरता नजर नहीं आता और आप, इस खौफ से बेखबर कि जाने कब कहाँ जुर्माना लग जाए मुक्त हवा से बिचरते रहते हैं.
कुल मिलाकर छोटे छोटे से ये गाँव एक विकसित देश का हिस्सा होने के साथ साथ इस बात का भी एहसास कराते रहते हैं कि बेशक मानव चाँद पर पहुँच जाए और क्यूँ न वह हो जाए पूरी तरह मशीनों पर आश्रित। परन्तु प्रकृति की महत्ता और उसका सुकून आज भी उसके लिए संजीवनी की तरह है जो उसे संरक्षण ही नहीं देती बल्कि उसकी चलती साँसों का शुद्धिकरण भी कर देती है।

इन गाँवों में आज भी दिखती है वो अंग्रेजी संस्कृति जो शहरों में पूरी तरह नदारद है। “बिबरी ” की संकरी सडकों पर चलती पुरानी मॉडल की महंगी कारें, उनमें सजे धजे बैठे वृद्ध जोड़े और यहाँ तक कि पालतू कुत्तों को घुमाने के लिए भी सूट , बूट और टाई लगाकर बेहद कायदे से निकले वहां के नागरिक, जो कुत्तों द्वारा त्याग किया गया मल साथ लाये प्लास्टिक के थेली में उठा रहे थे और जिसे बाद में वह निर्धारित जगह पर फेंकेंगे, इस बात का संकेत दे रहे थे कि दुनिया में कहीं अगर डिप्लोमेसी और सफैस्टीकेशन की परिभाषा पूछी जाए तो अंग्रेजों का आज भी कोई सानी नहीं। यह और बात है कि अब इनकी भी यह संस्कृति सिर्फ इन गाँवों में ही देखने को मिलती है, शहर तथाकथित रूप से मॉडर्न या कहूँ कि गंदे हो चले हैं। 

खैर जो भी हो एक दिन में सारी प्रकृति आँखों में भरकर हम चल पड़े। कंट्री साईट में यूरोप का कोई मुकाबला नहीं। अब तक के रास्तों में ही शहरी थकावट उतर चुकी थी, मन और दिमाग ताज़ा हो चुका था और हम तैयार थे अपनी दूसरी मंजिल के लिए – जो था लॉन्ग लीट . इसकी बातें अगली पोस्ट में …अगर लिख गईं तो :). 

तब तक आप निहारिये इन तस्वीरों को.