Yearly Archives: 2014

     “भारत के घरों में बाथरूम की बनावट में सुधार की सबसे अहम जरुरत है. जिसे देखो वह वहीँ गिरता है. जब भी सुनने को मिले कि फलाना गिर गया, हड्डी टूट गई या फलानी फिसल गई, कुल्हा टूट गया. यह पूछने की जरुरत ही नहीं पड़ती कि कहाँ?  कैसे?.…

अब उन पीले पड़े पन्नो से उस गुलाब की खुशबू नहीं आतीजिसे किसी खास दो पन्नो के बीच दबा  दिया करते थे जो छोड़ जाता थाअपनी छाप शब्दों परऔर खुद सूख कर और भी निखर जाता था  ।अब एहसास भी नहीं उपजते उन सीले पन्नो से जो अकड़ जाते थे खारे पानी को पीकरऔर गुपचुप अपनी बात कह…

 कैसा होगा वह समय, जब यह तय हुआ होगा कि औरतें घर के काम करेंगी और आदमी बाहर जा कर जीविका कमाएंगे। कैसा होगा वह पुरुष जिसने पहली बार किसी स्त्री से कहा होगा  कि तुम घर में रहो, यह काम करो, मैं बाहर जाता हूँ. कैसा लगा होगा उस स्त्री को…

व्हाट द फ … ये इंटरनेट है या ब्लडी बैलगाड़ी। 5 मिनट में एक पेज अपलोड होता है.  मॉम मैंने आपको कल नया हेयर कलर मगाने को बोला था अभी तक नहीं आया.ओह शिट। इस डॉक्टर के यहाँ इतनी वेटिंग में कौन बैठेगा।यह बहुत बड़ा है, हाथ थक गए लिखते…

हमारे देश में ९० % लोग अपनी आजीविका से संतुष्ट नहीं हैं, उनकी क्षमता और कौशल कुछ और होते हैं, वह कोशिश व काम किसी और के लिए करते हैं और बन कुछ और ही जाते हैं. नतीजा यह होता है कि वे अपने काम से झुंझलाए रहते हैं और इस मजबूरी में…

हमारे देश में सैक्स और संस्कृति दो शब्द ऐसे हैं जिन पर जब चाहे हंगामा करा लो. एक जुबान से निकला नहीं कि हंगामा और दूसरा न निकले तो हंगामा। हमें बच्चों के सामने सैक्स से सम्बंधित माँ बहन की गाली देने से परहेज नहीं है, खजुराहो, कोणार्क की मूर्ति कला…

कल एक आधिकारिक स्क्रिप्ट पर आये फीडबैक को देखकर मेरे एक कलीग कहने लगे, – “ऐसे फीडबैक देते हैं तुम्हारे यहाँ? लग रहा है सिर्फ कमियां ढूंढने की कोशिश करके पल्ला झाड़ा गया है, बजाय इसके कि इसमें सुधार के लिए कोई गाइड लाइन दी जाती”  अब मैं उन्हें यह क्या बताती कि…

मेरे ऑफिस की खिड़की से दीखता है, बड़े पेड़ का एक छोटा सा टुकड़ा। जो छुपा लेता है उसके पीछे की सभी अदर्शनीय चीजों को. उन सभी दृश्यों को जिन्हें किसी भी नजरिये से खूबसूरत नहीं कहा जा सकता। फिर भी उन शाखाओं के पीछे से मैं  झाँकने की कोशिश …

बरगद की छाँव सा  शहरों में गाँव सा  भंवर में नाव सा  कोई और नहीं होता।  फूलों में गुलाब सा  रागों में मल्हार सा  गर्मी में फुहार सा  कोई और नहीं होता।  नारियल के फल सा  करेले के रस सा  खेतों में हल सा  कोई और नहीं होता। पूनम की निशा…

все те же Я тоже была наивной, В воды Волги опустив ноги В воды, смешанные с моими слезами Все равно вспоминала о Ганге. Горы видела – горы Урала, Только думала о Гималаях. И не знала я о том раньше: Да, зовут их, порой, непохоже, Только вода все та же Только…