कवितायें

अहसास तेरी मासूम निगाहों का मेरी सर्द निगाहों से इस कदर मिला कि  सारी क़ायनात पीछे छोड़ कर मैं तेरी नज़रों मे मशगूल हो गया। तेरे दिल के सॉफ आईने मे देखा जो तसव्वुर अपना मैने सारे जमाने की मोहब्बत का हसीन अहसास अधूरा हो गया। सुनी जो धीमी-धीमी रुनझुन तेरे…

कहीं सुनहरी बदन सेकती, कहीं किसी का बदन जलाती चिलचिलाती धुप कहीं रुपसी करती है डाइटिंग कहीं जान से मारती है भूख. कहीं फ़ैशन है कम कपड़ों का , कहीं एक ओड़नी को तरसता योवन कहीं  बर्गर ,कोक में डूबा कोई, कहीं कूड़े में वाड़ा पाँव ढूँढता बचपन. वही है…

बंद खिड़की के पीछे खड़ी वो, सोच रही थी की खोले पाट खिड़की के, आने दे ताज़ा हवा के झोंके को, छूने दे अपना तन सुनहरी धूप को. उसे भी हक़ है इस आसमान की ऊँचाइयों को नापने का, खुली राहों में अपने , अस्तित्व की राह तलाशने का, वो…

पापा तुम लौट आओ ना, तुम बिन सूनी मेरी दुनिया, तुम बिन सूना हर मंज़र, तुम बिन सूना घर का आँगन, तुम बिन तन्हा हर बंधन.  पापा तुम लौट आओ ना याद है मुझे वो दिन,वो लम्हे , जब मेरी पहली पूरी फूली थी, और तुमने गद-गद हो 100 का…

हर सुबह आती है जैसे , रात के जाने के बाद. याद उनकी आती है, उनके खो जाने के बाद. ज़िंदगी की राह में, अक्सर ही ऐसा होता है,  गुनगुनाते हैं हम नगमे,  शब्द खो जाने के बाद. लेके ज़हन में घूमते हैं, तस्वीर किसी की यूँ सदा, कि  देख…

कौन कहता है दर पे उसके, देर है- अंधेर नही, मुझे तो रोशनी की एक, झलक भी नही दिखती. मिलना हो तो मिलता है, ख़ुशियों का अथाह समुंदर भी, पर चाहो जब तो उसकी, एक छोटी सी लहर भी नही दिखती. हज़ारों रंग के फूल हैं, दुनिया के बगानों में,…

काश तुम -तुम ना होते, काश हम – हम ना होते. जब ये ठंडी हवा , गालों को छूकर बालों को उड़ा जाती, जब मुलायम ओस पर सुनहरी धूप पड़ जाती काश उस गीली ओस पर तब हम, तुम्हारा हाथ थामे चल पाते. जब कोई अश्क चुपके से, इन आँखों…

कभी देखो इन बादलों को! जब काले होकर आँसुओं से भर जाते हैं, तो बरस कर इस धरा को धो जाते हैं. कभी देखो इन पेड़ों को,  पतझड़ के बाद भी, फिर फल फूल से लद जाते हैं, ओर भूखों की भूख मिटाते हैं. कभी देखो इन नदियों को, पर्वत…

हसरतों के चरखे पर, धागे ख़्वाबों के बुनते रहे यूँ ही हम गिरते रहे , यूँ ही हम चलते रहे. पहले क़दम पर फ़ासला था, कई कोसों दूर का, फिर भी हम हँसते हुए सीड़ी दर सीड़ी चड़ते रहे. ना जाने क्या खोया, जाने पाया क्या दोर’ए सफ़र फूल कांटें…

ख्वाइशों की कश्ती में अरमानो की पतवार लिए जब हम निकले थे सपनो के समंदर में, तो सोचा न था वहाँ तूफ़ान भी आते हैं . कल्पना के पंख लगाये जब ये मन उड़ रहा था खुले आसमान में , तो ये मालूम न था कि वहाँ काले बादल भी…