कविता

क्या चाहा था, बहुत कुछ तो चाहा ना था क्या माँगा था खुदा से, बहुत कुछ तो माँगा ना था. जो मिला ख़ुशनसीबी थी पर थी, गम के आँचल से लिपटी, लगा बिन मांगे मोती मिला, पर था नक़ली वो मालूम ना था. हर सुख मिला पर था आँसुओं की आड़ में, हर फूल मिला पर था काटों के साथ…

ओरों की पूरी होते देख तमन्ना, हमने भी एक तमन्ना कर ली. ना जाने कितने ख्वाब देख डाले एक ही रात में, की ख्वाब देखने से ही हमने नफ़रत कर ली. खुशनसीब होते हों दुनिया के तम्न्नाई, हमने तो तमन्ना कर के ज़िंदगी बदल कर ली. जहाँ मैं सभी को हक़ है तमन्ना करने का, इस खुशफहमी ने भी आज़…

आज़ तो लगता है जैसे जहाँ मिल गया, ये ज़मीन मिल गई आसमान मिल गया. हों किसी के लिए ,ना हों मायने इसके, मुझे तो मेरा बस एक मुकाम मिल गया. एक ख्वाब थी ये मंज़िल ,जब राह पर चले थे, एक आस थी ये ख्वाइश जब ,मोड़ पर मुड़े थे, धीरे-धीरे ये एक मुश्किल इम्तहान हो गया, पर आज़…

फिर वही धुँधली राहें, फिर वही तारीक़ चौराहा. जहाँ से चले थे एक मुकाम की तलाश में, एक मंज़िल के एक ख्वाब के गुमान में पर घूम कर सारी गलियाँ आज़, फिर हैं मेरे सामने-  वही गुमनाम राहें , वही अनजान चौराहा. तय कर गये एक लंबा सफ़र, हल कर गये राह की सब मुश्किलातों को, पर आज़ खड़े हैं…

क्यों घिर जाता है आदमी, अनचाहे- अनजाने से घेरों में, क्यों नही चाह कर भी निकल पाता , इन झमेलों से ? क्यों नही होता आगाज़ किसी अंजाम का ,क्यों हर अंजाम के लिए नहीं होता तैयार पहले से? ख़ुद से ही शायद दूर होता है हर कोई यहाँ, इसलिए आईने में ख़ुद को पहचानना चाहता है, पर जो दिखाता…