कविता

हम जैसे जैसे ऊपर उठते हैंघटता जाता है हवा का दबाव.भारी हो जाता है,आसपास का माहौल. और हो जाता है,सांस लेना मुश्किल.ऐसे में जरुरी है कि,मुँह में रख ली जाए,कोई मीठी रसीली गोली,अपनों के प्रेम की.जिससे हो जाता हैसांस लेना आसानऔर कट जाता है सफ़रआराम से।…

कितनी ठिठुरन है आज  चलो न, पी आएं एक एक कप कॉफी  मैं लूंगी एक लार्ज कैपचीनो,  जिसपर बनाता है वह एक दिल,  चॉकलेट और अपनी कला से. तुम ले लेना अपनी लाटे,  सफ़ेद, दूध, चीनी से भरी. ये कॉफ़ी भी व्यक्तित्व का रूपक होती हैं न.…

उस बिंदास लड़की (चुड़ैल) के नाम, जिससे पीछा छूटना इस जन्म में तो मुमकिन नहीं है.  वह बनती है पत्थर पर है मोम सी. भरी रहती है हमेशा आँखों की टंकी। झट से छलक पड़ती है जो उसके हँसते – रोते। खुद को समझती लड़का, दिल के हर कोने तक है लड़की।  एक नंबर की झगड़ालू पर प्यार लुटाने वाली पड़ोसी की भी प्लेट से उठा…

बहुत याद आता है गुजरा ज़माना सान कर दाल भात हाथों से खाना। वो लुढ़कती दाल को थाली में टिकाना, गरम गरम दाल में उंगलियां डुबाना, फिर “उईमाँ” चिल्लाकर, रोनी सूरत बनाकर,   जली उँगलियों को मुँह तक ले जाना। खूब सारा भात परोस कर लाना, उसमें से आधा भी न खा पाना, मम्मी की नजरों से फिर खुद को बचाकर,…

पिता माँ से नहीं होतेवह नहीं लगाते चिहुंक कर गलेनहीं उड़ेलते लाड़नहीं छलकाते आँखें पल पलरोके रखते हैं मन का गुबारऔर बनते हैं आरोपीदेने के सिर्फ लेक्चर.पर तत्पर सदा हटाने को  हर कांटा बच्चों के पथ से खड़े वट वृक्ष की तरहदेते छाया कड़ी घूप मेंऔर रहते मौननहीं मांगते क़र्ज़ भीकभी अपने पितृत्व का।…

वो खाली होती है हमेशा। जब भी सवाल हो,क्या कर रही हो ? जबाब आता है कुछ भी तो नहीं हाँ कुछ भी तो नहीं करती वो बस तड़के उठती है दूध लाने को फिर बनाती है चाय जब सुड़कते हैं बैठके बाकी सब तब वो बुहारती है घर का मंदिर फिर आ जाती है कमला बाई फिर वो कुछ नहीं…

सिंधु घाटी से मेसोपोटामिया तक मोहन जोदड़ो से हड़प्पा तक  कहाँ कहाँ से न गुजरी औरत,  एक कब्र से दूसरी गुफा तक. अपनी सहूलियत से  करते उदघृत देख कंकालों को  कर दिया परिभाषित।  इस काल में देवी  उस में भोग्या   इसमें पूज्य  तो उसमें त्याज्या  बदलती रही रूप  सभ्यता दर सभ्यता।  जिसने जैसा चाहा उसे रच दिया  अपने अपने…

तेरी नजरों में अपने ख्वाब समा मैं यूँ खुश हूँबर्फ के सीने में फ़ना हो ज्यूँ ओस चमकती है.  अब बस तू है, तेरी नजर है, तेरा ही नजरिया  मैं चांदनी हूँ जो चाँद की बाँहों में दमकती है.    तेरी सांसों से जो आती है वह खुशबू है मेरी  रात की रानी तो तिमिर के संग ही महकती है.  बेशक फूलों से भरे हों बाग़…

यदि बंद करना है तो जाओ  पहले घर का एसी बंद करो.  हर मोड़ पर खुला मॉल बंद करो  २४ घंटे जेनरेटर से चलता हॉल बंद करो.  नुक्कड़ तक जाने लिए कार बंद करो  बच्चों की पीठ पर लदा भार बंद करो. नर्सरी से ही ए बी सी रटाना बंद करो  घर में चीखना चिल्लाना बंद करो.  बच्चों से मजदूरी करवाना बंद करो  कारखानों का प्रदुषण फैलाना…

चढ़ी चूल्हे पर फूली रोटी, रूप पे अपने इतराए पास रखी चपटी रोटी, यूँ मंद मंद मुस्काये हो ले फूल के कुप्पा बेशक, चाहे जितना ले इतरा पकड़ी तो आखिर तू भी, चिमटे से ही जाए. *** लड्डू हों या रिश्ते, जो कम रखो मिठास(शक्कर) तो फिर भी चल जायेंगे। पर जो की नियत (घी) की कमी, तो न बंध…