Gazal

जाने किसने छिड़क दिया है तेज़ाब बादलों पर, कि बूंदों से अब तन को ठंडक नहीं मिलती. बरसने को तो बरसती है बरसात अब भी यूँही, पर मिट्टी को अब उससे तरुणाई नहीं मिलती. खो गई है माहौल से सावन की वो नफासत, अब सीने में किसी के वो हिलोर…

  पिछले दिनों गिरीश पंकज जी की एक ग़ज़ल पढ़कर कुछ यूँ ख़याल आये. ये संघर्ष हद से गुजर न जाये देखना औरत टूट कर बिखर न जाये देखना.  बैठा तो दिया है मंदिर में देवी बनाकर  वो पत्थर ही बन न जाये देखना  रोज उठती है,झुकती है,लचीली है बहुत  एक दिन अकड़…

एक दिन मुझसे किसी ने कहा था, कि अपने लिए मांगी दुआ कबूल हो न हो पर किसी और के लिए मांगी दुआ जरुर क़ुबूल होती है.ये अहसास बहुत खूबसूरत लगा मुझे …और सच भी..बस उसी से कुछ ख्याल मन में आये अब ये ग़ज़ल है या नज़्म या कुछ…

लरजते होंटों की दुआओं का फन देखेंगे, दिल से निकली हुई आहों का असर देखेंगे, चाहे तू जितना दबा ले मन का तूफान मगर आज हम अपनी बफाओं का असर देखेंगे। गर लगी है आग इधर गहरी तो यकीनन सुलग तो रही होगी आंच वहां भी थोड़ी, उस चिंगारी को…

रो रो के धो डाले हमने, जितने दिल में अरमान थे।  हम वहाँ घर बसाने चले, जहाँ बस खाली मकान थे।  यूँ तो दिल लगाने की, हमारी भी थी आरज़ू,  ढूँढा प्यार का कुआँ वहाँ, जहाँ लंबे रेगिस्तान थे।  हम तो यूँ ही बेठे थे तसव्वुर में किसी के, बिखरे…

आँखों से गिरते अश्क को बूँद शबनम की कहे जाते हैं जब्त ए ग़म की आदत है हम यूँ ही जिए जाते हैं । गर न मिले सर रखने को शाना,बहाने का अश्क फिर क्या मजा। रख हाथ गेरों के शाने पर, हम यूँ ही थिरकते जाते हैं जब्त ए ग़म की…

तू समझे न समझे दीवानगी मेरी, तेरे आगोश में मेरे मर्ज़ की दवा रक्खी है। दिल आजकल कुछ भारी- भारी लगता है, उसपर तेरी याद की परत जो चढ़ा रक्खी है। आखों से लुढ़कते आँसू भी पी हम जाते हैं कि, बह न जाये वो तस्वीर जो उनमें बसा रक्खी…