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एक अंतहीन कथा –

एक अंतहीन कथा –

एक बड़े शहर में एक आलीशान मकान था. ऊंची दीवारें, मजबूत छत, खूबसूरत हवादार कमरे और बड़ी बड़ी खिड़कियाँ जहाँ से ताज़ी हवा आया करती…'

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अपना भविष्य अपने हाथ…

अपना भविष्य अपने हाथ…

“महिला लेखन की चुनौतियाँ और संभावना” महिला लेखन की चुनौतियां - कहाँ से शुरू होती हैं और कहाँ खत्म होंगी कहना बेहद मुश्किल है. एक स्त्री…'

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एक पाती उस पार…

एक पाती उस पार…

पता है; पूरे 18 साल होने को आये. एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई. लोग कहते हैं दुनिया बदल गई. पर आपको तो ऊपर से साफ़ नजर आता…'

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नॉस्टाल्जिया…

नॉस्टाल्जिया…

ऐ मुसाफिर सुनो,  वोल्गा* के देश जा रहे हो  मस्कवा* से भी मिलकर आना.  आहिस्ता रखना पाँव  बर्फ ओढ़ी होगी उसने  देखना कहीं ठोकर से…'

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ब्रिक्सिट का कैसा हो क्रिसमस.

ब्रिक्सिट का कैसा हो क्रिसमस.

यूँ देखा जाए तो यह साल  पूरी दुनिया के लिए ही खासा उथल पुथल वाला साल रहा. वहाँ भारत में नोटबंदी हंगामा मचाये रही, उधर अमरीका…'

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यथार्थ के आकाश पर कल्पना की उड़ान… ‘उडारी”

यथार्थ के आकाश पर कल्पना की उड़ान… ‘उडारी”

अरुणा सब्बरवाल जी का नया कहानी संग्रह जब हाथ में आया तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित किया उसके शीर्षक ‘उडारी’ ने ।जैसे हाथ में आते…'

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सर्वप्रिय प्रविष्ठियां

लड़कियों का स्कूल हो तो सावन के पहले सोमवार पर पूरा नहीं तो आधा स्कूल तो व्रत में दिखता ही था. अपने स्कूल का भी यही हाल था. सावन के सोमवारों में गीले बाल और माथे पर टीका लगाए लडकियां गज़ब खूबसूरत लगती थीं. ऐसे में अपना व्रती न होना…

निशा नहीं शत्रु, बस सुलाने आती है, चली जाएगी हो कितना भी गहन अन्धेरा, उषा अपनी राह बनाएगी समय की डोर थाम तू, मन छोड़ दे बहती हवा में वायुवेग के संग सुगंध फिर, तेरा जी महकाएगी. कार्य नियत उसे उतना ही, है जितनी सामर्थ्य जिसकी गांडीव मिला अर्जुन को…

कुछ दिन पहले ही मुझे डाक से “प्रवासी पुत्र” (काव्य संग्रह) प्राप्त हुई है. कवर खोलते ही जो पन्ने पलटने शुरू किये तो एक के बाद एक कविता पढ़ती गई और एक ही बैठक में पूरी किताब पढ़ डाली. ऐसा नहीं कि किताब छोटी थी बल्कि उसकी कवितायें इतनी गहन…

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