लोकप्रिय प्रविष्टियां

जाने किसने छिड़क दिया है तेज़ाब बादलों पर, कि बूंदों से अब तन को ठंडक नहीं मिलती. बरसने को तो बरसती है बरसात अब भी यूँही, पर मिट्टी को अब उससे तरुणाई नहीं मिलती. खो गई है माहौल से सावन की वो नफासत, अब सीने में किसी के वो हिलोर नहीं मिलती. अब न चाँद महकता है, न रात संवरती…

जी हाँ,मेरे पास नहीं है  पर्याप्त अनुभव  शायद जो जरुरी  है कुछ लिखने के लिए  नहीं खाई कभी प्याज रोटी पर रख कर  कभीनहीं भरा पानी  पनघट पर जाकर   बैलगाड़ी, ट्रैक्टर, कुआं और बरगद का चबूतरा सब फ़िल्मी बातें हैं मेरे लिए  “चूल्हा” नाम ही सुना है सिर्फ मैंने  और पेड़ पर चढ़ तोड़ना आम  एक एडवेंचर,एक खेल  जो कभी नहीं…

जबसे होश संभाला तब से ही लगता रहा कि मेरा जन्म का एक उद्देश्य घुमक्कड़ी भी है. साल में कम से कम १ महीना तो हमेशा ही घुमक्कड़ी के नाम हुआ करता था और उसमें सबसे ज्यादा सहायक हुआ करती थी भारतीय रेलवे. देखा जाए तो ३० दिन के टूर में १५  दिन तो ट्रेन के सफ़र में निकल ही…

कुछ कहते हैं शब्दों के पाँव होते हैं  वे चल कर पहुँच सकते हैं कहीं भी  दिल तक, दिमाग तक,जंग के मैदान तक.  कुछ ने कहा शब्दों के दांत होते हैं  काटते हैं, दे सकते हैं घाव, पहुंचा सकते हैं पीड़ा।  मेरे ख़याल से तो शब्द रखते हैं सिर्फ  अपने रूढ़ अर्थ  कब, कहाँ, कैसे,कहे, लिखे, सुने  गए   यह कहने सुनने वाले की नियत पर है निर्भर कोई भी शब्द अच्छा या…

रुकते थमते से ये कदम अनकही कहानी कहते हैं यूँ ही मन में जो उमड़ रहीं ख्यालों की रवानी कहते हैं रुकते थमते….. सीने में थी जो चाह दबी होटों पे थी जो प्यास छुपी स्नेह तरसती पलकों की दिलकश कहानी कहते हैं रुकते थमते…. धड़कन स्वतः जो तेज हुई अधखिले लव जो मुस्काये माथे पर इठलाती लट की नटखट…

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