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सच्चा ख्वाब

सच्चा ख्वाब

आज़ तो लगता है जैसे जहाँ मिल गया,ये ज़मीन मिल गई आसमान मिल गया.हों किसी के लिए ,ना हों मायने इसके,मुझे तो मेरा बस एक…'

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कसूर

कसूर

फिर वही धुँधली राहें, फिर वही तारीक़ चौराहा. जहाँ से चले थे एक मुकाम की तलाश में, एक मंज़िल के एक ख्वाब के गुमान में…'

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कौन

कौन

क्यों घिर जाता है आदमी, अनचाहे- अनजाने से घेरों में, क्यों नही चाह कर भी निकल पाता , इन झमेलों से ? क्यों नही होता…'

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