लोकप्रिय प्रविष्टियां

रिश्ते मिलते हों बेशक  स्वत: ही  पर रिश्ते बनते नहीं  बनाने पड़ते हैं। करने पड़ते हैं खड़े  मान और भरोसे का  ईंट, गारा लगा कर निकाल कर स्वार्थ की कील  और पोत कर प्रेम के रंग  रिश्ते कोई सेब नहीं होते  जो टपक पड़ते हैं अचानक  और कोई न्यूटन बना देता है  उससे कोई भौतिकी का नियम। या ग्रहण कर लेते हैं मनु श्रद्धा  और हो…

. आज इन पलकों में नमी जाने क्यों है  रवानगी भी इतनी थकी सी जाने क्यों है  जाने क्या लाया है समीर ये बहा के  सिकुड़ी सिकुड़ी सी ये हंसी जाने क्यों है. खोले बैठे हैं दरीचे  हम नज़रों के  आती है रोशनी भी  उन गवाक्षों से  दिख रहा है राह में आता हुआ उजाला  बहकी बहकी सी ये नजर जाने क्यों…

कड़कती सर्दी में क्रेमलिन. जब मैंने अपने रूस प्रवास पर यह पोस्ट लिखी थी तो जरा भी नहीं सोचा था कि इसकी और भी किश्ते लिखूंगी कभी .बस कुछ मजेदार से किस्से याद आये तो सोचा बाँट लूं आप लोगों के साथ. परन्तु मुझे सुझाव मिलने लगे कि और अनुभव लिखूं और मैं लिखती गई जो जो याद आता गया. पर  यहाँ तक पहुँचते…

काला धन काला धन सुन सुन कर कान तक काले हो चुके हैं ।  यूँ मुझे काला रंग खासा पसंद है। ब्लेक ब्यूटी की तो खैर दुनिया कायल है पर जब से जानकारों से सुना है की काले कपड़ों में मोटापा कम झलकता है तब से मेरी अलमारी में काफी कालापन दिखाई देने लगा है।  परन्तु काले धन के दर्शन…

होली आने वाली है। एक ऐसा त्योहार जो बचपन में मुझे बेहद पसंद था। पहाड़ों की साफ़ सुथरी, संगीत मंडली वाली होली और उसके पीछे की भावना से लगता था इससे अच्छा कोई त्योहार दुनिया में नहीं हो सकता।फिर जैसे जैसे बड़े होते गए उसके विकृत स्वरुप नजर आने लगे। होली के बहाने हुडदंग , और गुंडा गर्दी जोर पकड़ने लगी…

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