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Russian ambassador in India Mr. Alexander M. Kadakin Writes about The Book.
गर्भनाल पत्रिका में .
कुछ ब्लोग्स एवं न्यूज़ पोर्टल पर प्रकाशित समीक्षाएं
स्मृति से साक्षात्कार (मनोज फुर्सत में)
शिखा वार्ष्णेय रचित “स्मृतियों में रूस” और मेरी विहंगम दृष्टि(युग दृष्टि )
रसिया व् स्पोमिन्नानियाख – स्मृतियों में रूस(मेरी बातें )
“स्मृतियों में रूस”, रूस की रोचकता पर एक नजर(इनसाइड स्टोरी )
(“स्मृतियों में रूस “- एक पाठक की नजर से)(फुरसतिया )
स्मृतियों में रूस : जैसा मैने पाया(अपनी बात )
Department of Science & Technology
ये कहानी है एक मदमस्त, अल्हड, जिद्दी और साहसी लड़की की जिसने समय के बदलाव, इतिहास के एक बड़े घटनाचक्र का सामना बहुत बहादुरी के साथ किया. स्वाभिमानी शिखा ने हर परिस्थितीयों में हिम्मत के साथ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ी और उसमे सफलता भी पाई. किसी भी देश में बाहर और अन्दर में कितना अंतर हो सकता है और उसके ऊपर विषम आर्थिक परिस्थितियां, इसका शिखा ने बखूबी जिक्र अपनी पुस्तक में किया है. मै भी रूस से जुड़ा हुआ हूँ लेकिन मैंने आज का रूस ज्यादा देखा है, जबकि शिखा उस रूस का हिस्सा थी जिस पर सारी दुनिया की निगाहें थी की किस तरह रूसी उन मुश्किल हालातों का सामना करते हैं, उस पर वहां रहने वाले विदेशी विद्यार्थीयों, जो स्चोलारशिप के भरोसे रूस आये थे, उनके सपने टूटने लगे थे, ऐसे में शिखा जैसे दृढ निश्चयी ही उस माहौल में न केवल अपने आप को ज़मीन पर खड़ा रख पाए, बल्कि अपने पूर्व निर्धारित लक्ष्य को पा कर अपने आगे की दुनिया में बढ़ गए. ठीक ही कहा है, ईश्वर उनकी ही मदद कर पाते हैं, जो हालातों का सामना करने का ज़ज्बा रखते हैं. शिखा पर हमें नाज़ है. उम्मीद है उनकी ये पुस्तक, हमारे नौजवानों को हिम्मत न हारने का, और आगे बदने के लिए मुश्किल हालातों का सामना करने को प्रेरित करेगी.
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आपकी किताब ‘स्मृतियों में रूस’ कल हाथ में आई और आज बस में बैठ कर और क्लास्सेस के बीच ब्रेक में , पूरी खतम कर दी. पढ़ के बहुत अच्छा लगा. खासकर के फोटो सब देख के किताब पढ़ना तो बहुत ही अच्छा लगा. किताब पढ़ने के चक्कर में आज सिर्फ बच्चों को सवालों के बीच फंसा कर रखा… हे हे हे……वैसे इसके तो पार्ट-२ पार्ट-३ भी आने चाहिए…….एस अलगता है और भी जानना बाकि रह गया है रूस के बारे में वो भी आपकी स्मृति की कलम और अनुभूति की स्याही से लिखी हुई.
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स्मृतियों में रूस
यात्रा वृतांत २०१० के लिये परिकल्पना सम्मान तथा वर्ष की सर्वश्रेष्ठ लेखिका के रूप में संवाद द्वारा सम्मानित शिखा वार्ष्णेय की पुस्तक स्मृतियों में रूस डायमंड पाकेट बुक्स अभी हाल में ही प्रकाशित हुयी है। आवरण पृष्ठ पर दृष्टि डालते हुये पूर्व सोवियत के वैशिष्ट्य से परिलक्षित चर्चों के कलश वर्फ की चादर में ढके हुये मनमोह लेते हैं। आवरण चित्र का रंग सामंजस्य नि:सन्देह हड्डियों तक प्रभावित करने वाली रूस की ठ्ण्ड का किसी को भी सहज स्मरण दिलाने के लिये पर्याप्त है।-
शिखा जी नमस्ते! आज हमने आपकी किताब पढ़ी बहुत अच्छा लिखी हैं आप रूस के बारे में, रोचक ढंग से…बधाई
Anand Dwevediअभी अभी ‘शिखा वार्ष्णेय’ जी कि पुस्तक “स्मृतियों में रूस” पढ़ी है , कैसा इत्तेफाक है कि बिना रूस गए ही एक रूस मेरी स्मृतियों में भी बसा हुआ था ! बात मेरे बचपन की है मेरे पडोसी थे गांव में कामरेड मोहनलाल विश्वकर्मा , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भा क पा के लोगों के लिए रूस उन दिनों वही अहमियत रखता था जैसे मुसलमानों के लिए मक्का मदीना ईसाईयों और यहूदियों के लिए यरुसलम ! लियोनिद ब्रेझनेव वहाँ के राट्रपति / सत्ताप्रमुख हुआ करते थे उन दिनों ……तो कामरेड विश्वकर्मा हमेशा उस देश कि जादुई तस्वीर लोगों के सामने उतारा करते थे जिनमे बहुत सारी तस्वीरें मेरे भी बाल मन पर अंकित हो गयीं थी … आज भी याद है मुझे जब आज से कोई ३० साल पहले विश्वकर्मा जी बताया करते थे कि कैसे उस देश में सीढियां आदमियों को स्वयं लेकर ऊपर और नीचे आती जाती हैं (स्क्लेटर ) आपको अपने पांव नहीं चलाने पड़ते बस उन सीढ़ियों पर खड़े हो जाना भर होता है| लोग समूहों में उनकी स्वप्नलोक जैसी बातें सुनते थे और मैं उन सबमे सबसे आगे हुआ करता था |
खैर बात शिखा जी की पुस्तक ‘स्मृतियों में रूस’ की ……
सरल ग्राह्य भाषा में लिखी गयी पुस्तक शुरू से अंत तक पाठक को बांधे रखने में सक्षम है प्रस्तुतिकरण ऐसा कि आप पढ़ना शुरू करें तो बस पढ़ कर ही खतम करें रूस हमेशा से ही भारतवासियों के लिए बहुत अहम रहा है | एक सच्चा मित्र देखा है हमने और पाया भी है | वहाँ के रहन सहन वहाँ के खान पान, भाषा और विशेषकर रूसियों के मन में झांककर भारतीयों के प्रति उनके सहज विश्वाश को परिलक्षित करती हुई ये पुस्तक आपके सामने विखंडन के दौर के रूस की मुकम्मल तस्वीर रखती है साथ में ये भी बताती है कि कैसे एक भारतीय परिवेश में पली बढ़ी लड़की नितांत अजनबी वातावरण जहाँ की भाषा का A B C भी उसे पता नहीं था कैसे अपने आपको उन परिस्थितियों के अनुरूप ढालती है और एक स्वर्णिम सफलता के साथ स्वदेश वापस आती है !
पुस्तक में दिए गए चित्र पुस्तक की विशेषता हैं जो पाठकों को रूस की एक छवि बनाने में मदद करते हैं कुल ७६ पृष्ठों की पुस्तक जो की भारतीय मानसिकता के अनुसार हाथ में लेते समय कुछ मंहगी लगती है (३०० रूपये मूल्य + ४२ रपये टैक्स और डाक खर्च इत्यादि ) मगर पुस्तक पढ़ कर खतम करते समय पहली भावना के एकदम उलट एक संतुष्टि दे जाती है |
शिखा जी को अच्छे संस्मरण लेखन के लिए बहुत बहुत बधाईसरस दरबारी : ” स्मृतियों में रूस …शिखा वार्ष्णेय द्वारा लिखा , एक बहुत ही खूबसूरत संस्मरण है. एक बेहद रोचक अनुभव . भाषा और शैली इतनी सरल और बहाव इतना सहज और गतिशील कि लगा एक कश्ती में बैठी हूँ और वह बहती जा रही है और यह किताब धीरे धीरे पन्ना दर पन्ना उस नदी के किनारे उद्घटित होती जा रही है और में वह सब कुछ अपनी दृष्टि से देख पा रही हूँ जो शिखा दिखाना चाह रही है …..वहाँ के दर्शनीय स्थल, वहाँ के गाँव,…वहां की परियाँ, वहाँ का परिवेश….वे बाज़ार, वह नादानियाँ वह शोखियाँ, जो इस संस्मरण का एक अन्तरंग हिस्सा है, और वैसा ही अनुभव हुआ जैसे लेखिका को हुआ होगा …यह उनकी लेखनी का प्रभाव ही है कि किताब ख़त्म होने तक मुझे भी शिखा के रूस से प्यार हो गया …!रवि शर्मा : “स्मृतियों में रूस” पढ़ना मेरे लिए बेहद अच्छा अनुभव रहा…चेहरे पे मुस्कराहट तो किताब के आखिरी पन्ने तक कायम रही.बहुत ही अच्छा लिखा है शिखा जी ने.किताब काफी मजेदार है.कभी मस्ती के पल
तो कभी इमोशनल पल..बिलकुल ऐसा लगा की जैसे मैं किताब नहीं कोई फिल्म देख रहा हूँ.जितने भी चैप्टर हैं किताब में सभी के शीर्षक भी बड़े मजेदार से हैं जैसे “चाय दे दे मेरी माँ” और “वो कौन थी”.दोबारा जरूर पढूंगा.पिया वर्मा : पहले तो बता दूँ की मैंने बहुत दिनों बाद कोई हिंदी किताब पढ़ी है और मुझे बहुत अच्छा लगा ये किताब पढ़ना..सबसे अच्छी बात की किताब में कोई कठिन शब्द नहीं हैं(जो मेरे लिए अच्छी बात थी).किताब में लेखिका के नज़र से जितना भी रूस को देखा वो बड़ा प्यारा लगा.मुझे तो अपने कॉलेज के दिन और दोस्तों की याद भी आती रही किताब पढ़ते वक़्त.शिखा जी ने बहुत अच्छी किताब लिखी है.उन्हें ऐसी कई और किताबें लिखनी चाहिए.ये बड़ा फील-गुड सा किताब लगा मुझे.अपने दोस्त की मैं शुक्रगुज़ार हूँ, जिसने ये किताब मुझे रिकमेंड किया.
हिमांशु शेखर : मुझे याद नहीं की आखिरी बार कब मैंने कोई किताब एक दो घंटे में ही ख़त्म कर दिया हो.’स्मृतियों में रूस’ की सबसे अच्छी बात ये है की इसमें बहुत हीं रोचकता से सब कुछ लिखा गया है.मेरे कुछ करीबी दोस्त भी विदेश पढने गए थे, और वो जब आते थे तो ऐसे ही किस्से सुनाते थे जैसा की किताब में मुझे पढने को मिला.कवितायें भी कुछ हैं किताब हैं वो भी मुझे बहुत अच्छी लगी.ये एक बेहतरीन किताब है.
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Jis tarah ap ke blog tak pahucha woh achanak tha , koi sahab mujhe google + pe dhoondhte aa pahuche jinhe m sayad hi janta tha unki wajah se apki freelancing hindi writing per nazar padhi thodha kangala toh paya ki koi behad paripakva lekhak hai
kintu main ab tak apni lekhni se sivaya khud ki kuntha k aur kuch na kar paya hoon pandulipiya jahan m paida hoti hain mar jati hain .
Jaha tak baat k apke lekhan ki toh mehaj keh sakta hu kaltmakta , sahas eyam anand ka samagam hota hoga apki rachnao main …kher bina padhe rai na do toh behtar hoga ..
Nischit ap prashansa ki patra hain …niji jeevan main atva ek acadamic jantu hone ki vivasta hi apke lekhan k vivechan ko badhya karti h magar electronics ki duniya maya jaal lagti hai
apni kisi kriti ko hum tak muahiya karaiyega .
Subhakamanye apko jo apni rachit ko grahast se dabya nahi …
Apke uttar ki pratiksha main