लोकप्रिय प्रविष्टियां

डेढ़ महीने की  छुट्टियों के बाद भारत से लौटी हूँ. और अभी तक छुट्टियों का खुमार बाकी है.कुछ लिखने का मन है पर शब्द जैसे अब भी छुट्टी पर हैं,काम पर आने को तैयार नहीं. तो सोचा आप लोगों को तब तक इन छुट्टियों में हुई मुलाकातों का ब्यौरा ही दे दूं. भारत जाने से पहले भी कुछ जाने माने…

कुछ लोग जब बन जाते हैं बड़े तो बढ़ता है उनका पद पर नहीं बढ़ता उनका कद। वे रह जाते हैं छोटे, मन, वचन और कर्म से। उड़ते हुए हवा में छोड़ देते हैं जमीं और लगा देते हैं ठोकर जमीं से जुड़े हुए लोगों को। उड़ा देते हैं मिट्टी को फूंक से समझ कर पाँव की धूल। फिर उड़ते…

हे नारी तू हड़प्पा है… अब आप सोच रहे होंगे कि भाई, नारी का हड़प्पा से क्या सम्बन्ध ? तो जी ! जैसे हड़प्पा की खुदाई चल रही है सदियों से, रोज़ नए नतीजे निकाले जाते, हैं फिर उन्हें अपने शब्दों में ढाल इतिहास बना दिया जाता है … ऐसे ही बेचारी नारी है- खुदाई दर खुदाई हो रही है…

अरुणा सब्बरवाल जी का नया कहानी संग्रह जब हाथ में आया तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित किया उसके शीर्षक ‘उडारी’ ने ।जैसे हाथ में आते ही पंख फैलाने को तैयार. लगा कि अवश्य ही यथार्थ के आकाश पर कल्पना की उड़ान लेती कहानियाँ होंगी और वाकई पहली ही कहानी ने मेरी सोच को सच साबित कर दिया । संग्रह के…

भावनाऐं हिंदी कविता की  किताब हो गईं हैं जो  ढेरों उपजती हैं  पर पढीं नहीं जातीं. ****** भावनाऐं  प्रेशर कुकर भी हैं  जब बढ़ता है दबाब तो मचाती हैं शोर  चाहती है सुने कोई कि पक चुकी हैं. बंद की जाये आंच अब.  ********* भावनाओं का ज्वर जब चढ़ता   है  तो चाहिए होता है स्पर्श  माथे पर ठंडी पट्टी सा  दो  चम्मच मधुर…

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