लोकप्रिय प्रविष्टियां

 दिल्ली पुस्तक मेले का परिसर, खान पान में व्यस्त जनता। किसी भी मेले का अर्थ मेरे लिए होता है, कि वहां वह सब वस्तुएं देखने, खरीदने को मिलें जो आम तौर पर बाजारों और दुकानों में उपलब्ध नहीं होतीं। और यही उत्सुकता मुझे पिछले महीने के,भारत में प्रवास के आखिरी दिन की व्यस्तता के बीच भी दिल्ली पुस्तक मेले में खींच ले…

(कार्टून गूगल से साभार ) हम भारतीय लोग स्वभाव से बड़े ही जल्दबाज होते हैं. झट से फैसले लेते हैं और झट से ही फैसला सुना देते हैं. हर काम , हर बात में जल्दबाजी। दूसरों की होड़ में जल्दबाजी , फिर उसमें कमियां निकालने में जल्दबाजी, फिर खुद को कोसने में जल्दबाजी, राय बनाने में जल्दबाजी, राय देने में…

  अभी कुछ दिन पहले करण समस्तीपुर की एक पोस्ट पढ़ी कि कैसे उन्होंने अपनी सद्वाणी  से एक दुर्लभ सा लगने वाला कार्य करा लिया जिसे उन्होंने गाँधी गिरी कहा.और तभी से मेरे दिमाग में यह बात घूम रही है कि भाषा और शब्द कितनी अहमियत रखते हैं हमारी जिन्दगी में. यूँ कबीर भी कह गए हैं कि- ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा…

ब्रिटेन आजकल एक अजीब दौर से गुजर रहा है। हाल ही में, लाखों ब्रिटिश नागरिक लंदन की सड़कों पर अपनी आज़ादी और अधिकार मांगते हुए नज़र आए। उनका कहना है कि उन्हें अपना देश वापस चाहिए, क्योंकि अब यह देश उनके लिए पहले जैसा नहीं रहा। वे महसूस करते हैं कि वे अब अपने ही देश में अल्पसंख्यक बन गए…

माँ!आज़ ज्यों ही मैं तेरे गर्भ की गर्माहट में निश्चिंत हो सोने लगी मेने सुना तू जो पापा से कह रही थी। और मेरी मूंदी आँखें भर आईं खारे पानी से। क्यों माँ! क्यों नही तू चाहती की मैं दुनिया में आऊँ ? तेरे ममता मयी आँचल में थोड़ा स्थान मैं भी पाऊँ ? भैया को तेरी गोद में मचलते…

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