लोकप्रिय प्रविष्टियां

बरगद की छाँव सा  शहरों में गाँव सा  भंवर में नाव सा  कोई और नहीं होता।  फूलों में गुलाब सा  रागों में मल्हार सा  गर्मी में फुहार सा  कोई और नहीं होता।  नारियल के फल सा  करेले के रस सा  खेतों में हल सा  कोई और नहीं होता। पूनम की निशा सा  पथ में दिशा सा  जीवन में “पिता” सा  कोई…

  अभी कुछ दिन पहले करण समस्तीपुर की एक पोस्ट पढ़ी कि कैसे उन्होंने अपनी सद्वाणी  से एक दुर्लभ सा लगने वाला कार्य करा लिया जिसे उन्होंने गाँधी गिरी कहा.और तभी से मेरे दिमाग में यह बात घूम रही है कि भाषा और शब्द कितनी अहमियत रखते हैं हमारी जिन्दगी में. यूँ कबीर भी कह गए हैं कि- ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा…

मैंने अलगनी पर टांग दीं हैं  अपनी कुछ उदासियाँ  वो उदासियाँ  जो गाहे बगाहे लिपट जाती हैं मुझसे  बिना किसी बात के ही  और फिर जकड लेती हैं इस कदर  कि छुड़ाए नहीं छूटतीं  ये यादों की, ख़्वाबों की  मिटटी की खुश्बू की उदासियाँ  वो बथुआ के परांठों पर  गुड़ रख सूंघने की उदासियाँ  और खेत की गीली मिटटी पर बने  स्टापू की…

छतीस गढ़ के दैनिक  नवभारत में प्रकाशित एक आलेख. कुछ समय से ( खासकर भारतीय परिवेश में )अपने आस पास जितनी भी महिलाओं को अपने क्षेत्र  में सफल और चर्चित देख रही हूँ .सबको अकेला पाया है .किसी ने शादी नहीं की या कोई किसी हालातों की वजह से अलग रह रही हैं. और यह सवाल पीछा ही नहीं छोड़…

होली पर दुनिया गुझिया बना रही है और हम यह – सुनिये…. सुनिये….. ज़रा अपने देश से होली की फुआरें आ रही थीं  कभी फेसबुक पे तो कभी व्हाट्स एप पे गुझियायें परोसी जा रही थीं कुछों ने तो फ़ोन तक पे जलाया था और आज कहाँ कहाँ क्या क्या बना सबका बायो डाटा सुनाया था सुन सुनके गाथाएँ हमें भी जोश…

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