अधिकार हमने ले लिए सम्मान अभी बाकी है। बलिदान बहुत कर लिए, अभिमान अभी बाकी है। फर्लांग देहरी दिए बढ़ा, आसमाँ पे अपने कदम। खोल मन की सांकले, निकास अभी बाकी है। रूढ़ियों के घुप्प अंधेरे चीर बनकर ‘शिखा’ स्त्रीत्व से चमकता, स्वाभिमान अभी बाकी है।…
हाँ मैंने देखा था उसे उस रोज़ जब पंचर हो गया था उसकी कार का पहिया घुटने मोड़े बैठा था गीली मिट्टी में जैक लिए हाथ में घूर रहा था पहिये को और फिर बीच बीच में आसमान को शायद वहीँ से कुछ मदद की आस में गंदे नहीं करने थे उसे अपने हाथ पर गालों पर लग चुकी थी ग्रीस जतन में…
ऐ मुसाफिर सुनो, वोल्गा* के देश जा रहे हो मस्कवा* से भी मिलकर आना. आहिस्ता रखना पाँव बर्फ ओढ़ी होगी उसने देखना कहीं ठोकर से न रुलाना। और सुनो, लाल चौराहा* देख आना पर जरा बचकर जाना वहीँ पास की एक ईमारत में लेनिन सोया है उसे नींद से मत जगाना। मत्र्योश्काओं* का शहर है वह एक बाबुश्का* को जरूर मनाना …
यह साल खास था. कुछ अलग. अलग नहीं, बहुत अलग. इतना अलग कि मैं मुड़ मुड़ कर देखती रही, पूछती रही – “ ए जिन्दगी ! तुम मेरी ही हो न? किसी और से बदल तो न गईं? तुम ऐसी तो न थीं. न जाने कितना कुछ अप्रत्याशित घटा. कितने ही पल ऐसे आये जिन्हें दुनिया ख़ुशी कहती है. मैं…
छतीस गढ़ के दैनिक नवभारत में प्रकाशित एक आलेख. कुछ समय से ( खासकर भारतीय परिवेश में )अपने आस पास जितनी भी महिलाओं को अपने क्षेत्र में सफल और चर्चित देख रही हूँ .सबको अकेला पाया है .किसी ने शादी नहीं की या कोई किसी हालातों की वजह से अलग रह रही हैं. और यह सवाल पीछा ही नहीं छोड़…