इंटर नेट नहीं था तो उसका एक फायदा हुआ | दो बहुत ही बेहतरीन पुस्तकें पढ़ने का मौका मिल गया. एक तो समीर लाल जी की ” देख लूँ तो चलूँ ” आ गई भारत से कनाडा और फिर यॉर्क होती हुई. दूसरी संगीता जी की ” उजला आस्मां ” आखिर कार दो महीने भारत में ही यहाँ वहां भटक कर…





