लोकप्रिय प्रविष्टियां

पहले जब वो होती  थी  एक खुमारी सी छा जाती थी  पुतलियाँ आँखों की स्वत ही  चमक सी जाती थीं  आरक्त हो जाते थे कपोल   और सिहर सी जाती थी साँसें  गुलाब ,बेला चमेली यूँ ही  उग आते  थे चारों तरफ. पर अब वह होती है तो  कुछ भी नहीं होता  ना राग बजते  हैं  ना फूल खिलते हैं ना हवा…

इस आदम कद दुनिया में, लोगों का सैलाब है पर इंसान कहाँ हैं? रातों के अंधेरे मिटाने को, बल्ब तो तुमने जला दिए पर रोशनी कहाँ है? तपते रेगिस्तानों में भी बना दी झीलें तुमने पर आंखों का पानी कहाँ है? सजाने को देह ऊपरी, हीरे जवाहरात बहुत हैं पर चमकता ईमान कहाँ है? इस कंक्रीट के जंगल में मकान…

बचपन में हम बहनें बहुत लड़ा करती थीं ..सभी भाई बहन का ये जन्म सिद्ध अधिकार है ..और लड़ते हुए गुस्से में एक दूसरे  को ना जाने क्या क्या कह दिया करते थे .तब मम्मी बहुत डाँटती थीं , कि शुभ शुभ बोला करो, ना जाने कौन से वक़्त माँ सरस्वती ज़ुबान पर बैठ जाये , और तीन  बार कुछ…

  पूरी किताब लिखकर छपवाने के बाद पुस्तक की लेखिका शिखा वार्ष्णेय जब बेहद, मासूमियत से हमसे पूछतीं हैं कि मेरी किताब ‘देशी चश्मे से लंदन डायरी’ किस विधा के अन्तर्गत आएगी तो उनकी सादगी पर बहुत प्यार आता है और कहीं पढ़ी ये पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती है…. ‘लीक पर वे चलें जिनके पग हारे हों’। अब चाहें…

ऐसा भी होता है आजकल … चलिए सुन ही लीजिये.. 🙂 आवाज ….??,  हमारी ही है. अब हमारे ब्लॉग पर अपनी आवाज देने का और कौन रिस्क लेगा 🙂 . दोस्तो!!!  लन्दन का मौसम आजकल बहुत प्यारा है  ऐसे में टूरिस्टों का बोलबाला है  इसी दौरान हमारी एक मित्र भी भारत से पधारी  उनके स्वागत में हमने की सारी तैयारी …

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