लोकप्रिय प्रविष्टियां

पहले जब वो होती  थी  एक खुमारी सी छा जाती थी  पुतलियाँ आँखों की स्वत ही  चमक सी जाती थीं  आरक्त हो जाते थे कपोल   और सिहर सी जाती थी साँसें  गुलाब ,बेला चमेली यूँ ही  उग आते  थे चारों तरफ. पर अब वह होती है तो  कुछ भी नहीं होता  ना राग बजते  हैं  ना फूल खिलते हैं ना हवा…

मेरी पिछली पोस्ट पर काफी विचार विमर्श हुआ. विषय का  स्त्री पुरुष के पूरक होने से , या उनके सम्मान से या फिर किसी तथाकथित नारी या पुरुष वाद से कोई लेना – देना  नहीं था. एक सीधा सादा सा प्रश्न था. कि क्या स्त्री विवाह को अपने करियर के उत्थान में बाधक महसूस करती है.? सभी विचारों का यहाँ उलेल्ख संभव नहीं फिर भी…

एक आंटी अंकल आये थे आज बड़ी सी चमचमाती कार में, वह बाते कर रहे थे दीदी से कुछ कागजों पर लिखा पढी भी की  सारा आश्रम देखा बाद में पूछा था उसने, तो दीदी ने बताया था, छोटू को लेने आये है छोटू को पूरा ग्लास दूध मिलेगा, बिना पानी मिला , मलाई वाला. और तीनों वक़्त का खाना भी,…

आज सुबह राशन खरीदने टेस्को (सुपर स्टोर) गई तो वहां का माहौल कुछ बदला बदला लग रहा था. घुसते ही एक स्टाफ की युवती दिखी जो भारतीय वेश भूषा में सजी हुई थी. मुझे लगा हो सकता है इसका जन्मदिन होगा। सामान्यत: यहाँ एशियाई तबकों में अपने जन्मदिन पर परंपरागत लिबास में काम पर जाने का रिवाज सा है. परन्तु थोड़ा…

होली के सच्चे रंग नही अब यहाँ खून की है बोछर दीवाली पर फूल अनार नही अब मानव बम की गूँजे आवाज़ ईद पर गले मिलते नही क्यों गले काटते हैं अब लोग क्रिसमस पर अब पेड़ नही लाशों का ढेर सजाते हैं क्यों लोग हो लोडी,ओडम या तीज़,बैशाखी अब बजते हैं बस द्वेष राग सस्ती राज़नीति मैं बिक गये…

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