सुबह की चाय की प्याली और रफ़ी के बजते गीतों के साथ एक हुड़क आज़ भी दिल में हिलकोरे सी लेती है दिल करता है छोड़ छाड़ कर ये बेगाना देश और ये लोग ऊड जाएँ इसी पल थाम कर अपनो के प्रेम की कोई डोर। मन पंछी उड़ान भर रहा था उसके अपने ख़यालों में कि हक़ीक़त ने ली अंगड़ाई…






