होरी खेलन चल दिए श्री मुसद्दी लाल कुर्ता धोती श्वेत चका चक, भर जेब में अबीर गुलाल. दबाये मूँह में पान, कि आज़ नही छोड़ेंगे संतो भौजी को तो, आज़ रंग के ही लौटेंगे. और फिर भोली छवि भौजी की, अंखियन में भर आई बिन गुलाल लाल भए गाल, होटन पे मुस्की सी छाई. आने लगी याद लड़कपन की वो…





