जब भी कभी होती थी संवेदनाओं की आंच तीव्र तो उसपर अंतर्मन की कढाही चढ़ा कलछी से कुछ शब्दों को हिला हिला कर भावों का हलवा सा बना लिया करती थी और फिर परोस दिया करती थी अपनों के सम्मुख और वे भी उसे सराह दिया करते थे शायद मिठास से अभिभूत हो कर , पर अब उसी कढाही में …
कुछ कहते हैं शब्दों के पाँव होते हैं वे चल कर पहुँच सकते हैं कहीं भी दिल तक, दिमाग तक,जंग के मैदान तक. कुछ ने कहा शब्दों के दांत होते हैं काटते हैं, दे सकते हैं घाव, पहुंचा सकते हैं पीड़ा। मेरे ख़याल से तो शब्द रखते हैं सिर्फ अपने रूढ़ अर्थ कब, कहाँ, कैसे,कहे, लिखे, सुने गए यह कहने सुनने वाले की नियत पर है निर्भर कोई भी शब्द अच्छा या…




