जब भी कभी होती थी संवेदनाओं की आंच तीव्र तो उसपर  अंतर्मन की कढाही चढ़ा कलछी से कुछ शब्दों को  हिला हिला कर भावों का हलवा सा  बना लिया करती थी और फिर परोस दिया करती थी अपनों के सम्मुख और वे भी उसे  सराह दिया करते थे शायद  मिठास से  अभिभूत हो कर , पर अब उसी कढाही में …

सभी साहित्यकारों से माफी नामे सहित . कृपया निम्न रचना को निर्मल हास्य के तौर पर लें. आजकल मंदी का दौर है उस पर गृहस्थी का बोझ है  इस काबिल तो रहे नहीं कि  अच्छी नौकरी पा पायें  तो हमने सोचा चलो  साहित्यकार ही बन जाएँ  रोज कुछ शब्द  यहाँ के वहां लगायेंगे और नए रंगरूटों को  फलसफा ए लेखन सिखायेंगे कुछ नए…

कुछ कहते हैं शब्दों के पाँव होते हैं  वे चल कर पहुँच सकते हैं कहीं भी  दिल तक, दिमाग तक,जंग के मैदान तक.  कुछ ने कहा शब्दों के दांत होते हैं  काटते हैं, दे सकते हैं घाव, पहुंचा सकते हैं पीड़ा।  मेरे ख़याल से तो शब्द रखते हैं सिर्फ  अपने रूढ़ अर्थ  कब, कहाँ, कैसे,कहे, लिखे, सुने  गए   यह कहने सुनने वाले की नियत पर है निर्भर कोई भी शब्द अच्छा या…

यकीन मानिये मैं जब भी यश चोपड़ा  की कोई फिल्म देखती थी उसके मनोरम दृश्यों को देख यही ख्याल आता था “अरे क्या है ऐसा स्विट्ज़रलैंड में जो हमारे यहाँ नहीं मिलता इन्हें ..क्या भारत में बर्फ नहीं पड़ती? या यहाँ हसीं वादियाँ और पहाड़ नहीं हैं ?गायों और झरनों की कोई कमी है क्या भारत में? और वो बैल की घंटी…

मुझे नफरत है  नम आँखों से मुस्कुराने वालों से  मुझे नफरत है  दिल के छाले छिपा जाने वालों से। मुझे नफरत है  ऍफ़ बी पर गोलगप्पे से सजी प्लेट की  तस्वीर लगाने वालों से  नफरत है मुझे  रोजाना चाट उड़ाने वालों से।  मुझे नफरत उनसे भी है  जो पानसिंह तोमर देखने के बाद  नुक्कड़ की दुकान पर  दही – गुलाब जामुन…