सर उठा रहा भुजंग है क्रोध, रोष, दंभ है बेबस है लाल भूमि के शत्रु हो रहा दबंग है फलफूल रहा आतंक है और सो रहा मनुष्य है अपनी ही माँ की छाती पर वो उड़ेल रहा रक्त है जिन चक्षु में था नेह भरा वो पीड़ा से आज बंद हैं माँ कहे मुझे नहीं देखना मेरी कोख पर लगा…
जब से लिखना शुरू किया, हमेशा ही मेरे मित्र मुझे कहानी भी लिखने को कहते रहे. परन्तु मुझे हमेशा ही लगता रहा कि its not my cup of tea.फिर लगातार कुछ दोस्तों के दबाब के कारण और कुछ अपनी क़ाबलियत आजमाने के स्वाभाव के चलते यह पहला प्रयास किया .. और यह मेरी पहली कहानी इस माह (सितम्बर) की “बिंदिया” पत्रिका…