ताल तलैये सूख चले थे, कली कली कुम्भ्लाई थी । धरती माँ के सीने में भी एक दरार सी छाई थी। बेबस किसान ताक़ रहा था, चातक भांति निगाहों से, घट का पट खोल जल बूँद कब धरा पर आएगी…. कब गीली मिटटी की खुशबू बिखरेगी शीत हवाओं में, कब बरसेगा झूम के सावन ऋतू प्रीत सुधा बरसायेगी। तभी श्याम…






