मैंने अलगनी पर टांग दीं हैं अपनी कुछ उदासियाँ वो उदासियाँ जो गाहे बगाहे लिपट जाती हैं मुझसे बिना किसी बात के ही और फिर जकड लेती हैं इस कदर कि छुड़ाए नहीं छूटतीं ये यादों की, ख़्वाबों की मिटटी की खुश्बू की उदासियाँ वो बथुआ के परांठों पर गुड़ रख सूंघने की उदासियाँ और खेत की गीली मिटटी पर बने स्टापू की…






