हो वेदकलीन तू मनस्वी या राज्य स्वामिनी तू स्त्री रही सदा ही पूजनीय तू बन करुणा त्याग की देवी सीता भी तू, अहिल्ल्या भी तू रंभा भी तू, जगदंबा भी तू है अगर गार्गी, मैत्रैई तो, रानी झाँसी, संयोगिता भी तू फिर क्यों तू आज़ भटक रही? पुरुष समकक्ष होने को लड़ रही? खो कर अस्तित्व ही अपना अधिकार ये…
{New Observer Post Hindi Daily 28th nov.2009 (online edition )में प्रकाशित.} एक जमाना था जब पत्रमित्रता जोरों पर थी.देश विदेश में मित्र बनाये जाते थे, उसे ज्ञान बाँटने का और पाने का एक जरिया तो समझा ही जाता था, बहुत से तथाकथित रिश्ते भी बन जाया करते थे।और कभी कभी ब्लेक मैलिंग का सामान भी . आज यही काम इंटर…




