कभी यूँ भी तो हो कि हम तुम मिलें और कोई काम की बात न हो. बेशक तुम लो चाय, मैं कॉफ़ी, और बस मुस्कुराहट हो. हों बहाने, शिकायतें, मशवरें, बस न हो कोई भी मकसद. मुफलिसी हो, मशक्कत हो, या फिर हो मशरूफ़ियत. आएं, बैठें, बोलें – बतियाएं, पर ज़हन में कोई उम्मीद न हो. हाँ कभी यूँ भी…

फिर वही धुँधली राहें, फिर वही तारीक़ चौराहा. जहाँ से चले थे एक मुकाम की तलाश में, एक मंज़िल के एक ख्वाब के गुमान में पर घूम कर सारी गलियाँ आज़, फिर हैं मेरे सामने-  वही गुमनाम राहें , वही अनजान चौराहा. तय कर गये एक लंबा सफ़र, हल कर गये राह की सब मुश्किलातों को, पर आज़ खड़े हैं…

BHU की समस्या और हालात के बारे में मैं इतना ही जानती हूँ जितना सोशल साइट्स पर पढ़ा. जितना भी समझ में आया उससे इतना अनुमान अवश्य लगा कि समस्या कुछ और है और हंगामा कुछ और. मुझे अपने स्कूल में हुआ एक वाकया याद आ रहा है. हमारा स्कूल एक छोटे से शहर का “सिर्फ लड़कियों के लिए” स्कूल…

क्या अब भी होली की टोली घर घर जाया करती है ? क्या सांझ ढले अब भी  महफ़िल जमाया करती है। क्या अब भी ढोलक की थापों पे ठुमरी, ख्याल सजाये जाते हैं ? “जोगी आयो शहर में व्योपारी” क्या अब भी गाये जाते हैं। क्या अबीर गुलाल की बिंदी हर माथे पे लगाई जाती है ? क्या गुटके रेता…

  हम पश्चिम की होड़ बेशक करें पर यह सच है कि पश्चिम कहीं से भी कुछ भी अच्छा सीखने और अपनाने में कभी शर्म या कोताही नहीं करता। कुछ भी अपने फायदे का मिले तो उसे खुले हाथों और दिमाग से अपनाना और उसे अपनी जीवन शैली और परिवेश के अनुरूप ढालना तो हमें कम से कम पश्चिम से…