आज भी जब हो जाते हैं मन के विचार गड्डमड्ड डिगने लगता है आत्मविश्वास डगमगाने लगता है स्वाभिमान नहीं सूझती कोई राह उफनने लगता है गुबार छूटने लगती है हर आस तो दिल मचल कर कहता है तुम कहाँ हो ? यहाँ क्यों नहीं हो? फिर एक किरण आती है नजर भंवर में जैसे मिल जाती है डगर भेद सन्नाटा…

मैंने अलगनी पर टांग दीं हैं  अपनी कुछ उदासियाँ  वो उदासियाँ  जो गाहे बगाहे लिपट जाती हैं मुझसे  बिना किसी बात के ही  और फिर जकड लेती हैं इस कदर  कि छुड़ाए नहीं छूटतीं  ये यादों की, ख़्वाबों की  मिटटी की खुश्बू की उदासियाँ  वो बथुआ के परांठों पर  गुड़ रख सूंघने की उदासियाँ  और खेत की गीली मिटटी पर बने  स्टापू की…

लन्दन का मौसम आजकल अजीब सा है या फिर मेरे ही मन की परछाई पड़ गई है उसपर.यूँ ग्रीष्म के बाद पतझड़ आने का असर भी हो सकता है.पत्ते गिरना अभी शुरू नहीं हुए हैं पर मन जैसे भावों से खाली सा होने लगा है. सुबह उठने के वक़्त अचानक जाने कहाँ से निद्रा आ टपकती है ऐसे घेर लेती है कि…

याद है तुम्हें ? उस रात को चांदनी में बैठकर  कितने वादे किये थे  कितनी कसमें खाईं थीं. सुना था, उस ठंडी सी हवा ने  जताई भी थी अपनी असहमति  हटा के शाल मेरे कन्धों से. पर मैंने भींच लिया था उसे  अपने दोनों हाथों से.  नहीं सुनना चाहती थी मैं  कुछ भी  किसी से भी. अब किससे करूँ शिकायत …

ये कैसा महान देश है मेरा…. कल के कर्णधार ही जहाँ भूखे नंगे फिरते हैं भावी सूत्रधार जहाँ ढाबे पर बर्तन घिसते हैं सृजन करने वाली माँ का जहाँ आँचल सूखा रहता है और सृजन का भागीदार  नशे में डूबा रहता है ये कैसा महान देश है मेरा…. देश चलाने वाले ही जब देश को बेचा करते हैं और रखवाले…