ताल तलैये सूख चले थे, कली कली कुम्भ्लाई थी । धरती माँ के सीने में भी एक दरार सी छाई थी। बेबस किसान ताक़ रहा था, चातक भांति निगाहों से, घट का पट खोल जल बूँद कब धरा पर आएगी…. कब गीली मिटटी की खुशबू बिखरेगी शीत हवाओं में, कब बरसेगा झूम के सावन ऋतू प्रीत सुधा बरसायेगी। तभी श्याम…
राष्ट्र मंडल खेल खतरे में हैं क्यों? क्योंकि एक जिम्मेदारी भी ठीक से नहीं निभा सकते हम .बड़े संस्कारों की दुहाई देते हैं हम. ” अतिथि देवो भव : का नारा लगाते हैं परन्तु अपने देश में कुछ मेहमानों का ठीक से स्वागत तो दूर उनके लिए सुविधाजनक व्यवस्था भी नहीं कर पाए. इतनी दुर्व्यवस्था कि मेहमान भी आने से मना…
तुम पर मैं क्या लिखूं माँ,तेरी तुलना के लिएहर शब्द अधूरा लगता हैतेरी ममता के आगेआसमां भी छोटा लगता हैतुम पर मैं क्या लिखूं माँ. याद है तुम्हें?मेरी हर जिद्द कोबस आख़िरी कहपापा से मनवा लेती थी तुम.मेरी हर नासमझी कोबच्ची है कहटाल दिया करती थीं तुम.तुम्हारा वह कठिन श्रम तब मुझे समझ आता था कहाँ तुम पर मैं क्या…



