होरी खेलन चल दिए श्री मुसद्दी लाल कुर्ता धोती श्वेत चका चक, भर जेब में अबीर गुलाल. दबाये मूँह में पान, कि आज़ नही छोड़ेंगे संतो भौजी को तो, आज़ रंग के ही लौटेंगे. और फिर भोली छवि भौजी की, अंखियन में भर आई बिन गुलाल लाल भए गाल, होटन पे मुस्की सी छाई. आने लगी याद लड़कपन की वो…

वह इतनी धार्मिक कभी भी नहीं थी. बल्कि अपने देश में होने वाले त्यौहारों की रस्मों पर अक्सर खीज कर उनके औचित्य पर माँ से जिरह कर बैठती थी. उसे यह सब कर्मकांड कौरी बकवास और फ़ालतू ही लगा करता था. फिर माँ के बड़े मनुहार के बाद उनका दिल रखने के लिए वह उन रस्मों को निभा लिया करती थी. परन्तु यहाँ…

वह बृहस्पतिवार का दिन था – तारीख 23 जून 2016  – जब एक जनमत संग्रह के लिए मतदान किया जाने वाला था. इसमें वोटिंग के लिए सही उम्र के लगभग सभी लोग वोट कर सकते थे वे फैसला लेने वाले थे कि यूके को  योरोपीय संघ का सदस्य बना रहना चाहिए या उसे छोड़ देना चाहिए.  इस जनमत संग्रह में…

सबसे पहले तो हिंदी साहित्य के सभी गुणीजनों  और ब्लॉगजगत के सभी साहित्यकारों से हाथ जोड़ कर और कान पकड़ कर माफी .कृपया इस पोस्ट को निर्मल हास्य के रूप में लें . हमारे हिंदी साहित्य में बहुत ही खूबसूरत और सार्थक विधाएं हैं और इनमें बहुत से रचनाकारों ने अपनी सिद्धता भी दर्ज की है .परन्तु मेरे खुराफ़ाती या…

तब डबल बेड पर चार और लोगों के साथ सिकुड़े – सिकुड़े लेट कर सोने में जो सुकून आता था, आज किंग साइज़ के पलंग पर फ़ैल कर सोने में भी नहीं आता. वह सुकून आपसी विश्वास का था. इस विश्वास का कि आजू बाजू जो लोग हैं वे अपने हैं, साथ हैं और हमेशा साथ और यदि हम साथ साथ हैं…