. आज इन पलकों में नमी जाने क्यों है रवानगी भी इतनी थकी सी जाने क्यों है जाने क्या लाया है समीर ये बहा के सिकुड़ी सिकुड़ी सी ये हंसी जाने क्यों है. खोले बैठे हैं दरीचे हम नज़रों के आती है रोशनी भी उन गवाक्षों से दिख रहा है राह में आता हुआ उजाला बहकी बहकी सी ये नजर जाने क्यों…






