लोकप्रिय प्रविष्टियां

“स्मृतियों में रूस” को प्रकाशित हुए साल हो गया. इस दौरान बहुत से पाठकों ने, दोस्तों ने, इस पर अपनी प्रतिक्रया से मुझे नवाजा. मेरा सौभाग्य है कि अब भी, जिसके हाथों में यह पुस्तक आती है वो मुझतक किसी न किसी रूप में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य ही पहुंचा देते हैं.पिछले दिनों दिल्ली के स्वतंत्र पत्रकार शिवानंद द्विवेदी”सहर ने इस…

मैं जब भी भारत जाती हूँ लगभग हर जगह बातों का एक विषय जरुर निकल आता है. वैसे उसे विषय से अधिक ताना कहना ज्यादा उचित होगा. वह यह कि “अरे वहां तो स्कूलों में पढाई ही कहाँ होती है.बच्चों का भविष्य बर्बाद कर रहे हो. यहाँ देखो कितना पढ़ते हैं बच्चे”. पहले पहल उनकी इस बात पर मुझे गुस्सा…

इंग्लिश समर की सुहानी शाम है,  अपोलो लन्दन के बाहर बेइन्तिहाँ  भीड़ है. जगजीत सिंह लाइव इन कंसर्ट है. “तेरी आवाज़ से दिल ओ ज़हन महका है तेरे दीद से नजर भी महक जाये ” कई दिनों से हो रहा यह एहसास जोर पकड़ लेता है. हम अन्दर प्रवेश करते हैं. थियेटर के अन्दर बार भी है. देखा लोग वहां से…

उसे इंडिया वापस जाना है. क्योंकि यहाँ उसे घर साफ़ करना पड़ता है ,  बर्तन भी धोने होते हैं ,  खाना बनाना पड़ता है.  बच्चे को खिलाने के लिए आया यहाँ नहीं आती.  जब उसे जुखाम हो जाए तो उसकी माँ नहीं आ सकती .  फिल्मो में होली,दिवाली के दृश्य देखकर उसे हूक उठती है. कि उसका बच्चा वह मस्ती नहीं…

एक बड़े शहर में एक आलीशान मकान था. ऊंची दीवारें, मजबूत छत, खूबसूरत हवादार कमरे और बड़ी बड़ी खिड़कियाँ जहाँ से ताज़ी हवा आया करती थी.  उस मकान में ज़हीन, खूबसूरत और सांस्कृतिक लोग प्रेम से रहा करते थे. पूरे शहर में उस परिवार की धाक थी. दूर दूर से लोग उनका घर देखने और उनके यहाँ अपना ज्ञान बढ़ाने…

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