लोकप्रिय प्रविष्टियां

अपनी कोठरी के छोटे से झरोखे से देखती हूँ दूर, बहुत दूर तक जाते हुए उन रास्तों को. पक्की कंक्रीट की बनी साफ़ सुथरी सड़कें खुद ही फिसलती जातीं सी क्षितिज तक जैसे और उन पर रेले से चलते जा रहे लोग अनगिनत, सजीले, होनहार,महान लोग. मैं भी चाहती हूँ चलना इसी सड़क पर और चाहती हूँ पहुंचना उस क्षितिज…

छतीस गढ़ के दैनिक  नवभारत में प्रकाशित एक आलेख. कुछ समय से ( खासकर भारतीय परिवेश में )अपने आस पास जितनी भी महिलाओं को अपने क्षेत्र  में सफल और चर्चित देख रही हूँ .सबको अकेला पाया है .किसी ने शादी नहीं की या कोई किसी हालातों की वजह से अलग रह रही हैं. और यह सवाल पीछा ही नहीं छोड़…

एक दिन पड़ोस की नानी और अपनी मुन्नी में ठन गई। अपनी अपनी बात पर दोनों ही अड्ड गईं। नानी बोली क्या जमाना आ गया है…  घड़ी घड़ी डिस्को जाते हैं,  बेकार हाथ पैर हिलाते हैं ये नहीं मंदिर चले जाएँ, एक बार मथ्था ही टेक आयें॥ मुन्नी चिहुंकी तो आपके मंदिर वाले डिस्को नहीं जाते थे? ये बात और…

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