लोकप्रिय प्रविष्टियां

लरजती सी टहनी पर झूल रही है एक कली सिमटी,शरमाई सी थोड़ी चंचल भरमाई सी   टिक जाती है हर एक की नज़र हाथ बढा देते हैं सब उसे पाने को  पर वो नहीं खिलती इंतज़ार करती है  बहार के आने का कि जब बहार आए तो कसमसा कर  खिल उठेगी वह  आती है बहार भी  खिलती है वो कली भी…

कल यहाँ (लन्दन में ) बी बी सी 3 पर भारत में हुए दामिनी हादसे और उसके प्रभाव पर एक कार्यक्रम दिखाया जा रहा था. जिसमें भारतीय मूल की एक ब्रिटिश लड़की नेट आदि पर उस हादसे को देखकर इतना विचलित होती है कि  वह खुद भारत जाती है, वहां लड़कियों की स्थिति का जायजा लेने। जाने से पहले वह अपनी अलमारी खोल कर ले…

मनोज जी ने अपने ब्लॉग पर प्रवासी पंछियों पर एक श्रंखला शुरू की है. जो मुझे बेहद पसंद है .क्योंकि उसमें मुझे अपने बचपन के बहुत से सवालों के जबाब मिल जाते हैं.ये कुछ पंक्तियाँ उन्हीं आलेखों से प्रेरित हैं. कहते हैं उड़ान परों से नहीं हौसलों से होती है पर क्या हौसला ही काफी है. हौसले के साथ तो …

जब से देश छूटा हिंदी साहित्य से भी संपर्क लगभग छूट गया और उसकी जगह (उस समय तो मजबूरीवश) रूसी, ग्रीक, स्पेनिश,अंग्रेजी आदि साहित्य ने ले ली. कभी कभार कुछ हिंदी की पुस्तकें उपलब्ध होतीं तो पढ़ ली जातीं। कई बार बहुत कोशिशें करके कुछ समकालीन हिंदी साहित्य खरीदा भी जिनमें कई तथाकथित चर्चित पुस्तकें भी शामिल थीं. परन्तु उनमें से बहुत…

१८ वीं और १९ वीं सदी के बहुत से पश्चिमी विद्वानों ने ये भ्रम फ़ैलाने की कोशिश की है कि भारत में ३०० – ४०० ईसा पूर्व जिस ब्राह्मी लिपि का विकास हुआ उसकी जड़े भारत से बाहर की हैं ,और इससे पहले भारत किसी भी तरह की लिखित लिपि से अनजान था. इसी सम्बन्ध में डॉ. Orfreed and Muller…

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