लोकप्रिय प्रविष्टियां

हसरतों के चरखे पर, धागे ख़्वाबों के बुनते रहे यूँ ही हम गिरते रहे , यूँ ही हम चलते रहे. पहले क़दम पर फ़ासला था, कई कोसों दूर का, फिर भी हम हँसते हुए सीड़ी दर सीड़ी चड़ते रहे. ना जाने क्या खोया, जाने पाया क्या दोर’ए सफ़र फूल कांटें राह के, हालाँकि हम चुनते रहे. फूल तो मुरझा गए,…

काली अँधेरी रात से हो सकता है  डर लगता हो तुमको  मैं तो अब भी स्याह रात में  तेरी याद का दिया जलाती हूँ। ये दिन तो गुजर जाता है  दुनिया के रस्मो रिवाजों में रात के आगोश में अब भी,  मैं गीत तेरे गुनगुनाती हूँ। दिन के शोर शराबे में  सुन नहीं सकता आहें मेरी इसलिए रात के संन्नाटे…

तेरे रुमाल पर जो धब्बे नुमायाँ हैं  साक्षी हैं हमारे उन एहसासात के   एक एक बूँद आंसू से जिन्हें  हमने साझा किया था  सागर की लहरों को गिनते  हुए. ******************************** इतनी देर तक जो  इकठ्ठा होते रहे उमड़ते रहे  घुमड़ते रहे  इन आँखों में. अब जो छलके तो  गुनगुने नहीं  ठन्डे लगेंगे  ये आंसू. ************************ * बंद होते ही पलक से  जो बूँद शबनम सी गिरती…

बचपन से राजा महाराजाओं ,राजघरानो के किस्से सुनते आये हैं.उनके वैभव, राजसी ठाट बाट, जो कभी भी किसी भी हालत में कम नहीं होते थे. बेशक जनता के घर खाली हो जाएँ पर राजा का खजाना कभी खाली नहीं होता था.. राज परिवार में से किसी की  भी सवारी नगर से निकलती तो सड़क के दोनों और जनता उमड़ पड़ती.बच्चे ,बूढ़े, स्त्रियाँ सभी करबद्ध खड़े…

मेरे ऑफिस की खिड़की से दीखता है, बड़े पेड़ का एक छोटा सा टुकड़ा। जो छुपा लेता है उसके पीछे की सभी अदर्शनीय चीजों को. उन सभी दृश्यों को जिन्हें किसी भी नजरिये से खूबसूरत नहीं कहा जा सकता। फिर भी उन शाखाओं के पीछे से मैं  झाँकने की कोशिश  करती रहती हूँ. उन हरी हरी पत्तियों के पीछे भूरी -भूरी  …

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