लोकप्रिय प्रविष्टियां

याद है तुम्हें ? उस रात को चांदनी में बैठकर  कितने वादे किये थे  कितनी कसमें खाईं थीं. सुना था, उस ठंडी सी हवा ने  जताई भी थी अपनी असहमति  हटा के शाल मेरे कन्धों से. पर मैंने भींच लिया था उसे  अपने दोनों हाथों से.  नहीं सुनना चाहती थी मैं  कुछ भी  किसी से भी. अब किससे करूँ शिकायत …

लन्दन में ओलम्पिक जोश अपने चरम पर है.27 जुलाई को उद्घाटन समारोह है.परन्तु अफ़सोस यह कि हमें उद्घाटन  की तो क्या पूरे खेलों में से किसी एक की भी टिकट नहीं मिली है. और हमें ही नहीं, हमारी पहुँच में जितने भी लोग हैं किसी को भी नहीं मिली है.ऐसे में हमने सोचा कि क्यों फिर ये छुट्टियां बर्बाद की जाएँ, जब…

मैं बचपन से ही कुछ सनकी टाइप हूँ. मुझे हर बात के पीछे लॉजिक ढूँढने   का कीड़ा है ..ये होता है तो क्यों होता है .?.हम ऐसा करते हैं तो क्यों करते हैं ? खासकर हमारे धार्मिक उत्सव और कर्मकांडों के पीछे क्या वजह है ?..इस बारे में जानने को मैं हमेशा उत्सुक रहा करती हूँ . बचपन में…

सुबह की धुंध में  उनीदीं आँखों से देखने की कोशिश में सिहराती हवा में, शीत में बरसते हो, बर्फीली ज्यूँ घटा से. लिहाफों में जा दुबकी है मूंगफली की खुशबू. आलू के परांठे पे गुड़ मिर्ची करते गुफ्तगू. लेकर अंगडाई क्या मस्ताते हो हाय दिसंबर तुम बहुत प्यारे हो.…

आसमान के ऊपर भी एक और आसमान है, उछ्लूं लपक के छू लूँ  बस ये ही अरमान है। बना के इंद्रधनुष को अपनी उमंगों का झूला , बैठूँ और जा पहुँचूँ चाँद के घर में सीधा। कुछ तारे तोडूँ और भर लूँ अपनी मुठ्ठी में, लेके सूरज का रंग भर लूँ सपनो की डिब्बी में। उम्मीदों का ले उड़नखटोला जा उतरूं…

वीडियो