लोकप्रिय प्रविष्टियां

छतीस गढ़ के दैनिक  नवभारत में प्रकाशित एक आलेख. कुछ समय से ( खासकर भारतीय परिवेश में )अपने आस पास जितनी भी महिलाओं को अपने क्षेत्र  में सफल और चर्चित देख रही हूँ .सबको अकेला पाया है .किसी ने शादी नहीं की या कोई किसी हालातों की वजह से अलग रह रही हैं. और यह सवाल पीछा ही नहीं छोड़…

अधिकार हमने ले लिए सम्मान अभी बाकी है। बलिदान बहुत कर लिए, अभिमान अभी बाकी है। फर्लांग देहरी दिए बढ़ा, आसमाँ पे अपने कदम। खोल मन की सांकले, निकास अभी बाकी है। रूढ़ियों के घुप्प अंधेरे चीर बनकर ‘शिखा’ स्त्रीत्व से चमकता, स्वाभिमान अभी बाकी है।…

बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा। न जाने क्यों नहीं लिखा। यूँ व्यस्तताएं काफी हैं पर इन व्यस्तताओं का तो बहाना है. आज से पहले भी थीं और शायद हमेशा रहेंगी ही. कुछ लोग टिक कर बैठ ही नहीं सकते। चक्कर होता है पैरों में चक्कर घिन्नी से डोलते ही रहते हैं. न मन को चैन, न दिमाग को, न ही पैरों को.…

कैसे कहूँ मैं भारतीय हूँ  क्यों करूँ मैं गुमान  आखिर किस बात का  क्या जबाब दूं उन सवालों का  जो “इंडियन” शब्द निकलते ही  लग जाते हैं पीछे … वहीँ न ,  जहाँ रात तो छोड़ो  दिन में भी महिलायें  नहीं निकल सकती घर से ? बसें , ट्रेन तक नहीं हैं सुरक्षित क्यों दूधमुंही बच्चियों को भी  नहीं बख्शते…

 कैसा होगा वह समय, जब यह तय हुआ होगा कि औरतें घर के काम करेंगी और आदमी बाहर जा कर जीविका कमाएंगे। कैसा होगा वह पुरुष जिसने पहली बार किसी स्त्री से कहा होगा  कि तुम घर में रहो, यह काम करो, मैं बाहर जाता हूँ. कैसा लगा होगा उस स्त्री को यह सुनकर। क्या उसने विरोध किया होगा ? या यह…

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