लोकप्रिय प्रविष्टियां

मोस्को में मेरी एक बहुत अच्छी मित्र थी श्रीलंका की… इतना अच्छा चिकेन बनाती  थी ना …रहने दीजिये वर्ना बाकी पोस्ट नहीं लिखी जाएगी .और इसका राज़ वो बताती थी वहां के मसाले .और भी बहुत  सी बातें की मोती बहुत अच्छे मिलते हैं वहां ,समुंद्री किनारे बहुत खूबसूरत हैं वगैरह वगैरह ..जिन्हें सुन सुन कर मेरा भी मन श्रीलंका देखने…

हो वेदकलीन तू मनस्वी या राज्य स्वामिनी तू स्त्री रही सदा ही पूजनीय  तू बन करुणा त्याग की देवी  सीता भी तू, अहिल्ल्या भी तू रंभा भी तू, जगदंबा भी तू है अगर गार्गी, मैत्रैई तो, रानी झाँसी, संयोगिता  भी तू फिर क्यों तू आज़ भटक रही? पुरुष समकक्ष  होने को लड़ रही? खो कर अस्तित्व ही अपना अधिकार ये…

जी हाँ,मेरे पास नहीं है  पर्याप्त अनुभव  शायद जो जरुरी  है कुछ लिखने के लिए  नहीं खाई कभी प्याज रोटी पर रख कर  कभीनहीं भरा पानी  पनघट पर जाकर   बैलगाड़ी, ट्रैक्टर, कुआं और बरगद का चबूतरा सब फ़िल्मी बातें हैं मेरे लिए  “चूल्हा” नाम ही सुना है सिर्फ मैंने  और पेड़ पर चढ़ तोड़ना आम  एक एडवेंचर,एक खेल  जो कभी नहीं…

कभी यूँ भी तो हो कि हम तुम मिलें और कोई काम की बात न हो. बेशक तुम लो चाय, मैं कॉफ़ी, और बस मुस्कुराहट हो. हों बहाने, शिकायतें, मशवरें, बस न हो कोई भी मकसद. मुफलिसी हो, मशक्कत हो, या फिर हो मशरूफ़ियत. आएं, बैठें, बोलें – बतियाएं, पर ज़हन में कोई उम्मीद न हो. हाँ कभी यूँ भी…

आज से कुछ वर्ष पूर्व जब इस देश में आना हुआ था तब सड़कों में भारी मात्रा में वाहन होने के बावजूद गज़ब की शांति महसूस हुआ करती थी. कायदे से अपनी -अपनी लेंन में चलतीं, बिना शोरगुल के लेन बदलतीं, ओवेरटेक करती गाडियां मुझे अक्सर आश्चर्य में डाल दिया करतीं कि आखिर बिना हॉर्न  दिए यहाँ का यातायात इतना…

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