लोकप्रिय प्रविष्टियां

सिंधु घाटी से मेसोपोटामिया तक मोहन जोदड़ो से हड़प्पा तक  कहाँ कहाँ से न गुजरी औरत,  एक कब्र से दूसरी गुफा तक. अपनी सहूलियत से  करते उदघृत देख कंकालों को  कर दिया परिभाषित।  इस काल में देवी  उस में भोग्या   इसमें पूज्य  तो उसमें त्याज्या  बदलती रही रूप  सभ्यता दर सभ्यता।  जिसने जैसा चाहा उसे रच दिया  अपने अपने…

कड़कती सर्दी में क्रेमलिन. जब मैंने अपने रूस प्रवास पर यह पोस्ट लिखी थी तो जरा भी नहीं सोचा था कि इसकी और भी किश्ते लिखूंगी कभी .बस कुछ मजेदार से किस्से याद आये तो सोचा बाँट लूं आप लोगों के साथ. परन्तु मुझे सुझाव मिलने लगे कि और अनुभव लिखूं और मैं लिखती गई जो जो याद आता गया. पर  यहाँ तक पहुँचते…

फरवरी के महीने में ठंडी हवाएं, अपने साथ यादों के झोकें भी इतनी तीव्रता से लेकर आती हैं कि शरीर में घुसकर हड्डियों को चीरती सी लगती हैं.फिर वही यादों के झोंके गर्म लिहाफ बनकर ढांप लेते हैं दिल को, और सुकून सा पा जाती रूह. कुछ  मीठे पलों की गर्माहट इस कदर ओढ़ लेता है मन कि पूरा साल…

                                         A Puppy Face हम अक्सर माता – पिता को ये कहते सुनते हैं ..” हे भगवान ये बच्चे भी न इतने चालाक हैं पूछो मत.” वाकई कभी कभी लगता है कि इन बच्चों के पेट में दाढी  होती है .हम जितना इन्हें समझते हैं उससे कहीं ज्यादा ये हमें समझते हैं ..कब कौन से हथकंडे अपना कर किस तरह अपना काम…

 नवभारत में प्रकाशित  क्या पुरुष प्रधान समाज में, पुरुषों के साथ काम करने के लिए,उनसे मित्रवत  सम्बन्ध बनाने के लिए स्त्री का पुरुष बन जाना आवश्यक है ?.आखिर क्यों यदि एक स्त्री स्त्रियोचित व्यवहार करे तो उसे कमजोर, ढोंगी या नाटकीय करार दे दिया जाता है और यही  पुरुषों की तरह व्यवहार करे तो बोल्ड, बिंदास और आधुनिक या फिर चरित्र हीन .यूँ मैं कोई नारी वादी…

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