लोकप्रिय प्रविष्टियां

एक दिन  उसने कहा कि नहीं लिखी जाती अब कविता लिखी जाये भी तो कैसे कविता कोई लिखने की चीज़ नहींवो तो उपजती है खुद ही फिर बेशक उगे कुकुरमुत्तों सी,या फिर आर्किड की तरहहर हाल में मालकिन है वो अपनी ही मर्जी की।कहाँ वश चलता है किसी का, जो रोक ले उसे उपजने से। हाँ कुछ भूमि बनाकर उसे बोया जरूर जा सकता है। बढाया भी जा सकता…

कुछ दिन पहले ही मुझे डाक से “प्रवासी पुत्र” (काव्य संग्रह) प्राप्त हुई है. कवर खोलते ही जो पन्ने पलटने शुरू किये तो एक के बाद एक कविता पढ़ती गई और एक ही बैठक में पूरी किताब पढ़ डाली. ऐसा नहीं कि किताब छोटी थी बल्कि उसकी कवितायें इतनी गहन और प्रभावी थीं कि पता ही नहीं चला कब एक…

सुनो आज मौसम बहुत हसीं है  फिफ्टी फिफ्टी  के अनुपात में सूरज और बादल टहल रहे हैं चलो ना , हम भी टहल आयें जेकेट – नहीं होगी उसकी ज़रूरत हाँ ले चलेंगे अपनी वो नीली छतरी जिसपर  गिरती हैं जब बारिश की बूँदेंतो रंग आसमानी सा हो जाता है और टप टप की आवाज के साथ लगता है जैसे खुले आकाश के नीचे कर रहा हो कोई…

देश में आजकल माहौल बेहद राजनीतिक हो चला है. समाचार देख, सुनकर दिमाग का दही हो जाता है.ऐसे में इसे ज़रा हल्का करने के लिए कुछ बातें मन की हो जाएँ. हैं एक रचना लिखने के लिए पहले सौ रचनाएँ पढनी पड़ती हैं।परन्तु कभी कभी कोई एक रचना ही पढ़कर ऐसे भाव विकसित होते हैं मन में, कि रचना में ढलने को…

हमारे देश में ९० % लोग अपनी आजीविका से संतुष्ट नहीं हैं, उनकी क्षमता और कौशल कुछ और होते हैं, वह कोशिश व काम किसी और के लिए करते हैं और बन कुछ और ही जाते हैं. नतीजा यह होता है कि वे अपने काम से झुंझलाए रहते हैं और इस मजबूरी में अपनाये अपने आजीविका के साधन के लिए किसी न किसी…

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