लोकप्रिय प्रविष्टियां

हथेली की रेखाओं में कभी सीधी कभी आड़ी सी पगडंडी पर लुढ़कती कभी बगीचों में टहलती बारिश बन बरसती कभी धूप में तपती नर्म ओस सी बिछती तो कभी शूल बन चुभती झरने सी झरती कभी नदिया सी बहती रहती मेज पे रखे प्याले से कभी चाय सी छलकती. ग़ज़ल सी कहती कभी कभी गीतों पे थिरकती . रातों के…

हर सुबह आती है जैसे , रात के जाने के बाद. याद उनकी आती है, उनके खो जाने के बाद. ज़िंदगी की राह में, अक्सर ही ऐसा होता है,  गुनगुनाते हैं हम नगमे,  शब्द खो जाने के बाद. लेके ज़हन में घूमते हैं, तस्वीर किसी की यूँ सदा, कि  देख ना पाएँगे उन्हें हम, आँख नम होने के बाद. आधी-अधूरी…

 नवभारत में प्रकाशित  क्या पुरुष प्रधान समाज में, पुरुषों के साथ काम करने के लिए,उनसे मित्रवत  सम्बन्ध बनाने के लिए स्त्री का पुरुष बन जाना आवश्यक है ?.आखिर क्यों यदि एक स्त्री स्त्रियोचित व्यवहार करे तो उसे कमजोर, ढोंगी या नाटकीय करार दे दिया जाता है और यही  पुरुषों की तरह व्यवहार करे तो बोल्ड, बिंदास और आधुनिक या फिर चरित्र हीन .यूँ मैं कोई नारी वादी…

समेटे हर लम्हा खुद में हर ख्वाब का इन पर बसेरा है झुकती हैं जब हौले से ये शर्मो हया की वो बेला है जो उठ जाएँ कुछ अदा से मन भंवर ये बबला हो जाये ये पलकें हैं प्यारी पलके न बोले पर सब कह जाएँ जो दो पल झपकें ये पलकें तन मन सुकून यूं पा जाये जो…

तेरे रुमाल पर जो धब्बे नुमायाँ हैं  साक्षी हैं हमारे उन एहसासात के   एक एक बूँद आंसू से जिन्हें  हमने साझा किया था  सागर की लहरों को गिनते  हुए. ******************************** इतनी देर तक जो  इकठ्ठा होते रहे उमड़ते रहे  घुमड़ते रहे  इन आँखों में. अब जो छलके तो  गुनगुने नहीं  ठन्डे लगेंगे  ये आंसू. ************************ * बंद होते ही पलक से  जो बूँद शबनम सी गिरती…

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