लोकप्रिय प्रविष्टियां

यह उस दौर की बात है जब न तो मोबाइल फ़ोन थे, न सोशल मीडिया और न ही पूरी दुनिया को एक क्लिक से जोड़ता हुआ इन्टरनेट. ले दे कर या काले चोगे वाला जम्बो टेलीफोन था, (जिसकी लोकल कॉल्स भी खासी महँगी थीं) या फिर दूरदर्शन. इनके इस्तेमाल पर भी माँ बाप का पहरा रहा करता था. तो बेचारे नए…

मेट्रो के डिब्बे में मिलती हैतरह तरह की जिन्दगी ।किनारे की सीट पर बैठी आन्नाऔर उसके घुटनों से सटा खड़ा वान्या    आन्ना के पास वाली सीट केखाली होने का इंतज़ार करताबेताब रखने को अपने कंधो परउसका सिरऔर बनाने को घेरा बाहों का।सबसे बीच वाली सीट परवसीली वसीलोविच,जान छुडाने को भागतेकमीज के दो बटनों के बीच       घड़े सी तोंद पे दुबकते सन से बाल   रात…

यह साल खास था. कुछ अलग. अलग नहीं, बहुत अलग. इतना अलग कि मैं मुड़ मुड़ कर देखती रही, पूछती रही – “ ए जिन्दगी ! तुम मेरी ही हो न? किसी और से बदल तो न गईं? तुम ऐसी तो न थीं. न जाने कितना कुछ अप्रत्याशित घटा. कितने ही पल ऐसे आये जिन्हें दुनिया ख़ुशी कहती है. मैं…

सुनो! पहले जब तुम रूठ जाया करते थे न, यूँ ही किसी बेकार सी बात पर मैं भी बेहाल हो जाया करती थी चैन ही नहीं आता था मनाती फिरती थी तुम्हें नए नए तरीके खोज के कभी वेवजह करवट बदल कर कभी भूख नहीं है, ये कह कर अंत में राम बाण था मेरे पास। अचानक हाथ कट जाने…

होरी खेलन चल दिए श्री मुसद्दी लाल कुर्ता धोती श्वेत चका चक, भर जेब में अबीर गुलाल. दबाये मूँह में पान, कि आज़ नही छोड़ेंगे संतो भौजी को तो, आज़ रंग के ही लौटेंगे. और फिर भोली छवि भौजी की, अंखियन में भर आई बिन गुलाल लाल भए गाल, होटन पे मुस्की सी छाई. आने लगी याद लड़कपन की वो…

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