लोकप्रिय प्रविष्टियां

खुशनुमा सी एक शाम को यूं ही बैठे, मन पर पड़ी मैली चादर जो झाड़ी तो, गिर पड़े कुछ मुरझाये वो स्वप्नफूल, बरसों पहले दिल में दबा दिया था जिनको. पर जैसे दिल में कहीं कोई सुराग था, की हौले हौले सांस ले रहे थे सपने, पा कर आज अंशभर ऊष्मा ली अंगडाई, उमंग खिलने की फिर से जाग उठी…

 http://shikhakriti.blogspot.co.uk/2013/09/blog-post_15.html  यहाँ से आगे।  अब तक यह तो विजया की समझ में आने लगा था कि घर की तीसरी मंजिल पर रहने वाले निखिल के सगे भैया, भाभी क्यों अजनबियों की तरह रहते हैं, क्यों उन्होंने घर में आने जाने का रास्ता भी बाहर से बना लिया है, और क्यों त्योहारों पर भी वह एक दूसरे को विश तक नहीं करते। हालाँकि बात उलटी भी…

मोस्को में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान, हमारे मीडिया स्टडीज के शिक्षक कहा करते थे कि पत्रकारिता किसी भी समय या सीमा से परे है. आप या तो पत्रकार हैं या नहीं हैं. यदि पत्रकार हैं तो हर जगह, हर वक़्त हैं. खाते, पीते, उठते, बैठते, सोते, जागते हर समय आप पत्रकारिता कर सकते हैं. आप बेशक सक्रीय पत्रकार न हों परन्तु…

आज हिंदी दिवस है.और हर जगह हिंदी की ही बातें हो रही हैं .मैं आमतौर पर इस तरह के दिवस या आयोजनों पर लिखने से बचती हूँ पर आज कुछ कहे बिना रहा नहीं जा रहा.आमतौर पर हिंदी भाषा के लिए जितने भी आयोजन होते हैं उनमें हिंदी को मृत तुल्य मान कर शोक ही मनाते देखा है.एक हँसती खेलती…

क्या अब भी होली की टोली घर घर जाया करती है ? क्या सांझ ढले अब भी  महफ़िल जमाया करती है। क्या अब भी ढोलक की थापों पे ठुमरी, ख्याल सजाये जाते हैं ? “जोगी आयो शहर में व्योपारी” क्या अब भी गाये जाते हैं। क्या अबीर गुलाल की बिंदी हर माथे पे लगाई जाती है ? क्या गुटके रेता…

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