इस पार से उस पार  जो राह सरकती है जैसे तेरे मेरे बीच से  होकर निकलती है एक एक छोर पर खड़े अपना “मैं “सोचते बड़े एक राह के राही भी कहाँ  “हम” देखते हैं. निगाहें भिन्न भिन्न हों दृश्य फिर अनेक हों हो सपना एक ,फिर भी कहाँ संग देखते हैं रात भले घिरी रहे या चाँदनी खिली रहे तारों…

कुछ कहते हैं शब्दों के पाँव होते हैं  वे चल कर पहुँच सकते हैं कहीं भी  दिल तक, दिमाग तक,जंग के मैदान तक.  कुछ ने कहा शब्दों के दांत होते हैं  काटते हैं, दे सकते हैं घाव, पहुंचा सकते हैं पीड़ा।  मेरे ख़याल से तो शब्द रखते हैं सिर्फ  अपने रूढ़ अर्थ  कब, कहाँ, कैसे,कहे, लिखे, सुने  गए   यह कहने सुनने वाले की नियत पर है निर्भर कोई भी शब्द अच्छा या…

भाषा – मेरे लिए एक माध्यम है अभिव्यक्ति का. अपनी बात सही भाव में अधिक से अधिक दूसरे  तक पहुंचाने का. अत: मैं यह मानती हूँ कि जितनी भी भाषाओं का ज्ञान हो वह गर्व की बात है परन्तु तब तक, जब तक किसी भाषा को हीन बना कर वह गर्व न किया जाये।  यूँ जरुरत के वक़्त भाषा को किसी…

कुछ दिन पहले एक दोपहर को दरवाजे की घंटी बजी,जाकर देखा  तो सूट, बूट, टाई में ३- ४ महानुभाव खड़े थे. उनमे से एक ने बड़ी शालीनता से आगे बढ़कर एक परचा थमाया और धन्यवाद कहकर चले गए. दरवाजा बंद करके मैंने पर्चे पर नजर डाली तो समझ में आया कि वह एक राजनैतिक पार्टी के चुनाव प्रचार का परचा है जिसमें उस पार्टी को वोट…

लन्दन में इस बार बसंत का आगमन ऐसा नहीं हुआ जैसा कि हुआ करता था. आरम्भ में ही सूखा पड़ने की आशंका की घोषणा कर दी गई. और  फिर लगा जैसे  बेचारे बादल  भी डर गए कि नहीं बरसे तो उन्हें भी कोई बड़ा जुर्माना ना कर दिया जाये और फिर उन्हें तगड़ी ब्याज दर के साथ ना जाने कब…