जबसे होश संभाला तब से ही लगता रहा कि मेरा जन्म का एक उद्देश्य घुमक्कड़ी भी है. साल में कम से कम १ महीना तो हमेशा ही घुमक्कड़ी के नाम हुआ करता था और उसमें सबसे ज्यादा सहायक हुआ करती थी भारतीय रेलवे. देखा जाए तो ३० दिन के टूर में १५  दिन तो ट्रेन के सफ़र में निकल ही…

काव्य का सिन्धु अनंत है शब्द सीप तल में बहुत हैं। चुनू मैं मोती गहरे उतर कर ऊहापोह में ये कवि मन है। देख मुझे यूँ ध्यान मगन पूछे मुझसे मेरा अंतर्मन, मग्न खुद में काव्य पथिक तुम जा रहे हो कौन पथ पर तलवार कर सके न जो पराक्रम कवि सृजन यूँ सबल समर्थ हो भटकों को लाये सत्य…

आँखों में ये खारा पानी कहाँ से आता है किस कैमिकल लोचे से यह होता है,सबसे पहले किसकी आँख में यह लोचा हुआ और क्यों ? और कब इसे एक इमोशन से जोड़ दिया गया,और कब एक स्त्रियोचित गुण बना दिया गया,यह सब हमें नहीं मालूम। हाँ इतना जरूर मालूम है कि, काफी समय से इस पर महिलाओं की मोनोपोली रही है। मर्दों के लिए यह…

अमरीका के एक प्रसिद्ध लेखक रे ब्रैडबेरि का कहना है कि अपनी आँखों को अचंभों से भर लो, जियो ऐसे कि जैसे अभी दस सेकेण्ड में गिर कर मरने वाले हो, दुनिया देखो, यह कारखानों में बनाए गए या खरीदे गए किसी भी सपने से ज्यादा शानदार है.  वाकई घुमक्कड़ी, यायावरी या पर्यटन ऐसी संपदा है जो आपके व्यक्तित्व को अमीर बनाती है और शायद…

बंद खिड़की के शीशों से  झांकती एक पेड़ की शाखाएं  लदी – फदी हरे पत्तों से  हर हवा के झोंके के साथ  फैला देतीं हैं अपनी बाहें  चाहती है खोल दूं मैं खिड़की आ जाएँ वो भीतर  लुभाती तो मुझे भी है  वो सर्द सी ताज़ी हवा  वो घनेरी छाँव  पर मैं नहीं खोलती खिड़की  नहीं आने देती उसे अन्दर शायद…