कंपकपाते पत्ते पर ठहरी एक बूँद ओ़स की बचाए हुए किसी तरह खुद को तेज़ हवा उड़ा न दे धूप कहीं सुखा न दे उतरी है आकाश से गिर न जाये धूल में पर आखिर मिलना पड़ता है उसे उसी मिट्टी में कंक्कड़ पत्थर के बीच ही और वो लुप्त हो जाती है उसी धूल मिटटी की धरा में प्राणी भी तो…




