छोड़ना होगा उसे वह घर वह आंगन, वह फर्श, वह छत। जिससे जुड़ा है उसका जन्म, बचपन, उसका यौवन, उसका जीवन। कहते हैं लोग इसी में उसकी भलाई है यही रीत चली आई है। अब वह खुद ही खुद को संभाले भोगे अपने सुख दुख अकेले पुराने नातों को बिसरा दे। वह ठिठकती है हर कदम पर निकलने में…







