पूरी किताब लिखकर छपवाने के बाद पुस्तक की लेखिका शिखा वार्ष्णेय जब बेहद, मासूमियत से हमसे पूछतीं हैं कि मेरी किताब ‘देशी चश्मे से लंदन डायरी’ किस विधा के अन्तर्गत आएगी तो उनकी सादगी पर बहुत प्यार आता है और कहीं पढ़ी ये पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती है…. ‘लीक पर वे चलें जिनके पग हारे हों’। अब चाहें…

मुझसे एक बार जिंदगी ने  कहा था पास बैठाकर। चुपके से थाम हाथ मेरा  समझाया था दुलारकर। सुन ले अपने मन की,  उठा झोला और निकल पड़।   डाल पैरों में चप्पल  और न कोई फिकर कर।    छोटी हैं पगडंडियां, पथरीले हैं रास्ते, पर पुरसुकून है सफ़र. मान ले खुदा के वास्ते। और मंजिल ? पूछा मैंने तुनक कर.  उसका…

हम जब बचपन में घर में आने वाली पत्रिकाएं पढ़ते तो अक्सर मम्मी से पूछा करते थे कि गर्मियों की छुट्टियां क्या होती हैं. क्योंकि पत्रिकाएं, गर्मियों में कहाँ जाएँ? कैसे छुट्टियां बिताएं, गर्मियों की छुट्टियों में क्या क्या करें और गर्मियों की छुट्टियों में क्या क्या सावधानी रखें, जैसे लेखों से भरी रहतीं। हमें समझ में नहीं आता था कि जिन गर्मियों की छुट्टी…

आइये आज आप सबको ले चलती हूँ रिवर थेम्स के क्रूज पर. नदी के किनारे बहुत सी  एतिहासिक इमारतें हैं और उनकी एक अपनी पहचान भी है ..पर मेरी नजरों को देखिये वो उनसे अलग भी कुछ देख लेती हैं ..तो आपको दिखाती हूँ कुछ तथ्य और कुछ अपने कथ्य 🙂  सबसे पहले  लन्दन आई – अरे मैं लन्दन नहीं आई.…

जब से लिखना शुरू किया, हमेशा ही मेरे मित्र मुझे कहानी भी लिखने को कहते रहे. परन्तु मुझे हमेशा ही लगता रहा कि its not my cup of tea.फिर लगातार कुछ दोस्तों के दबाब के कारण और कुछ अपनी क़ाबलियत आजमाने के स्वाभाव के चलते यह पहला प्रयास किया .. और यह मेरी पहली कहानी इस माह (सितम्बर) की “बिंदिया” पत्रिका…