ख्वाइशों की कश्ती में अरमानो की पतवार लिए जब हम निकले थे सपनो के समंदर में, तो सोचा न था वहाँ तूफ़ान भी आते हैं . कल्पना के पंख लगाये जब ये मन उड़ रहा था खुले आसमान में , तो ये मालूम न था कि वहाँ काले बादल भी छाते हैं… इस दिल के बगीचे में कुछ कोमल खुशबू…

क्रेमलिन – वर्ल्ड हेरिटेज साईट में शुमार. घर की मुर्गी दाल बराबर .बस यही होता है. जो चीज़ हमें सहजता से सुलभ हो जाये उसकी कदर ही कहाँ करते हैं  हम. और यही कारण होता है कि जिस जगह हम रहते हैं वहां के दर्शनीय स्थलों के प्रति उदासीन से रहते हैं .अरे  यहीं तो हैं कभी भी देख आयेंगे,…

पहले जब वो होती  थी  एक खुमारी सी छा जाती थी  पुतलियाँ आँखों की स्वत ही  चमक सी जाती थीं  आरक्त हो जाते थे कपोल   और सिहर सी जाती थी साँसें  गुलाब ,बेला चमेली यूँ ही  उग आते  थे चारों तरफ. पर अब वह होती है तो  कुछ भी नहीं होता  ना राग बजते  हैं  ना फूल खिलते हैं ना हवा…

सिंधु घाटी से मेसोपोटामिया तक मोहन जोदड़ो से हड़प्पा तक  कहाँ कहाँ से न गुजरी औरत,  एक कब्र से दूसरी गुफा तक. अपनी सहूलियत से  करते उदघृत देख कंकालों को  कर दिया परिभाषित।  इस काल में देवी  उस में भोग्या   इसमें पूज्य  तो उसमें त्याज्या  बदलती रही रूप  सभ्यता दर सभ्यता।  जिसने जैसा चाहा उसे रच दिया  अपने अपने…

रात के साये में कुछ पल मन के किसी कोने में झिलमिलाते हैं सुबह होते ही वे पल , कहीं खो से जाते हैं  कभी लिहाफ के अन्दर , कभी बाजू के तकिये पर कभी चादर की सिलवट पर  वो पल सिकुड़े मिलते हैं. भर अंजुली में उनको , रख देती हूँ सिरहाने की दराजों में  कल जो न समेट पाई तो ,…