विज्ञान कभी भी अपने दिमाग के दरवाजे बंद नहीं करता। बेशक वह दिल की न सुनता हो परंतु किसी भी अप्रत्याशित, असंभव या बेबकूफाना लगने वाली बात पर भी उसकी संभावनाओं की खिड़की बन्द नहीं होती। यही कारण है कि आज हम बिजली का बल्ब, हवाई जहाज या टेलीफोन जैसी सुविधाओं का सहजता से उपयोग करते हैं जिनकी इनके अविष्कार…

चाइल्ड ओबेसिटी पर मेरे पिछले लेख में बहुत से पाठकों ने बच्चों में दुबलेपन की शिकायत की.और कहा कि कुछ प्रकाश इस समस्या पर भी डाला जाये .मैं कोई डॉo  नहीं हूँ परन्तु इस समस्या के कुछ देखे भाले अनुभव हैं जिन्हें आपसे बांटना चाहती हूँ .शायद कुछ मदद हो सके. कुछ लोगों ने कहा कि बच्चे कुछ नहीं खाते.…

प्रकृति अपना संतुलन खुद बना लेती है. कितने संकेत दिए उसने, ग्लोबल वॉर्मिंग, पानी की कमी, सुनामी, भूकम्पों द्वारा कि रुक जाओ , संभल जाओ, वर्ना सब ख़त्म हो जायेगा. पर नहीं … हम मनु की संताने अपने आप को किसी ईश्वर से कम नहीं समझतीं. हम हर समस्या का हल निकाल लेंगे. दिमाग पाया है हमने ऐसा. कितना ज्यादा हो गया…

जबसे होश संभाला तब से ही लगता रहा कि मेरा जन्म का एक उद्देश्य घुमक्कड़ी भी है. साल में कम से कम १ महीना तो हमेशा ही घुमक्कड़ी के नाम हुआ करता था और उसमें सबसे ज्यादा सहायक हुआ करती थी भारतीय रेलवे. देखा जाए तो ३० दिन के टूर में १५  दिन तो ट्रेन के सफ़र में निकल ही…

जब से सोचने समझने लायक हुई, न जाने कितने सपने खुली आँखों से देखे. कभी कोई कहता कोरे सपने देखने वाला कहीं नहीं पहुंचता तो कभी कोई कहता कोई बात नहीं देखो देखो सपने देखने के कोई दाम पैसे थोड़े न लगते हैं.पर उनमें ही कुछ बेहद पोजिटिव और मित्र किस्म के लोग भी होते जो कहते कि अरे सपने…