विज्ञान कभी भी अपने दिमाग के दरवाजे बंद नहीं करता। बेशक वह दिल की न सुनता हो परंतु किसी भी अप्रत्याशित, असंभव या बेबकूफाना लगने वाली बात पर भी उसकी संभावनाओं की खिड़की बन्द नहीं होती। यही कारण है कि आज हम बिजली का बल्ब, हवाई जहाज या टेलीफोन जैसी सुविधाओं का सहजता से उपयोग करते हैं जिनकी इनके अविष्कार…
प्रकृति अपना संतुलन खुद बना लेती है. कितने संकेत दिए उसने, ग्लोबल वॉर्मिंग, पानी की कमी, सुनामी, भूकम्पों द्वारा कि रुक जाओ , संभल जाओ, वर्ना सब ख़त्म हो जायेगा. पर नहीं … हम मनु की संताने अपने आप को किसी ईश्वर से कम नहीं समझतीं. हम हर समस्या का हल निकाल लेंगे. दिमाग पाया है हमने ऐसा. कितना ज्यादा हो गया…



