बस काफी भरी हुई है .तभी एक जोड़ा एक बड़ी सी प्राम लेकर बस में चढ़ता है.लड़की के हाथ में एक बड़ा बेबी बैग है और उसके साथ के लड़की नुमा लड़के ने वह महँगी प्राम थामी हुई है.दोनो  प्राम को सही जगह पर टिका कर बैठ जाते हैं. प्राम में एक बच्चा सोया हुआ है खूबसूरत कम्बल से लगभग पूरा…

कभी यूँ भी तो हो कि हम तुम मिलें और कोई काम की बात न हो. बेशक तुम लो चाय, मैं कॉफ़ी, और बस मुस्कुराहट हो. हों बहाने, शिकायतें, मशवरें, बस न हो कोई भी मकसद. मुफलिसी हो, मशक्कत हो, या फिर हो मशरूफ़ियत. आएं, बैठें, बोलें – बतियाएं, पर ज़हन में कोई उम्मीद न हो. हाँ कभी यूँ भी…

पिछले कुछ दिनों बहुत भागा दौड़ी में बीते .२४ जून से २६ जून तक बर्मिघम  के एस्टन यूनिवर्सिटी में कुछ स्थानीय संस्थाओं और भारतीय उच्चायोग के सहयोग से तीन दिवसीय “यू के विराट क्षेत्रीय हिंदी सम्मलेन २०११” था .और हमारे लिए आयोजकों से फरमान आ गया था कि आपको भी चलना है और वहाँ अपना पेपर  पढना भी है. अब क्या बोलना…

गुजर गया 2012 और कुछ ऐसा गुजरा कि आखिरी दिनों में मन भारी भारी छोड़ गया। यूँ जीवन चलता रहा , दुनिया चलती रही , खाना पीना, घूमना सब कुछ ही चलता रहा परन्तु फिर भी मन था कि किसी काम में लग नहीं रहा था . ऐसे में जब कुछ नहीं सूझता तो मैं पुस्तकालय चली जाया करती हूँ और वहां से…

हसरतों के चरखे पर, धागे ख़्वाबों के बुनते रहे यूँ ही हम गिरते रहे , यूँ ही हम चलते रहे. पहले क़दम पर फ़ासला था, कई कोसों दूर का, फिर भी हम हँसते हुए सीड़ी दर सीड़ी चड़ते रहे. ना जाने क्या खोया, जाने पाया क्या दोर’ए सफ़र फूल कांटें राह के, हालाँकि हम चुनते रहे. फूल तो मुरझा गए,…