तू शिव है मैं शक्ति नहीं तू सत्य है मैं असत्य सही तू सुन्दर है मैं असुंदर वही पर कुछ है जो भीतर है गुनता है पर दिखता नहीं तूने कभी पूछा नहीं मैंने भी तो कहा नहीं कदाचित प्रेम है तभी तुलता नहीं।…
जानता है जल जायेगा फिर भी जाता है करीब शमा के वो ये जूनून पतंगे का हमें, इश्क करना सिखा गया। बोस्कोदेगामा जब निकला कश्ती पर खतरों से न वो अज्ञात था। पर जूनून उसके भ्रमण का हमें अपने भारत से मिला गया। जो न होता जूनून शहीदों में कैसे भला आजादी हम पाते जो न होता जूनून भगीरथ को कैसे…
बसंत पंचमी ( भारतीय प्रेम दिवस ) बीत गया है ,पर बसंत चल रहा है और वेलेंटाइन डे आने वाला है ..यानी फूल खिले हैं गुलशन गुलशन ..अजी जनाब खिले ही नहीं है बल्कि दामों में भी आस्मां छू रहे हैं ,हर तरफ बस रंग है , महक है ,और प्यार ही प्यार बेशुमार . …वैसे मुझे तो आजतक…
पिछले दिनों गिरीश पंकज जी की एक ग़ज़ल पढ़कर कुछ यूँ ख़याल आये. ये संघर्ष हद से गुजर न जाये देखना औरत टूट कर बिखर न जाये देखना. बैठा तो दिया है मंदिर में देवी बनाकर वो पत्थर ही बन न जाये देखना रोज उठती है,झुकती है,लचीली है बहुत एक दिन अकड़ ही न जाये देखना. नज़रों में छुपाये हैं हर आँख का…
समाचार माध्यमो द्वारा खबरों की शुचिता , उनको बढ़ा चढ़ा कर दिखाना, उनकी निष्पक्षता , और समाचारों के नाटकीकरण एक ज्वलंत मुद्दा बन चुका है आज, समाज के आम हलको में . वो कहते है ना की साहित्य समाज का आइना होता है तो आप लोगों को ऐसा नहीं लगता की इस समाचारों को हम तक पहुचाने वाले पत्रकारों की…