बच्चे न तो आपकी मिल्कियत होते हैं न ही फिक्स डिपॉजिट जिन्हें आप जब चाहें, जैसे मर्जी चाहें रख लें या भुना लें। बच्चे तो आपके माध्यम से इस समाज और दुनिया को दिया गया सर्वोत्तम उपहार हैं जिन्हें आप अपनी सम्पूर्ण क्षमता और अनुराग के साथ पालते हैं, निखारते हैं और इस दुनिया के लायक बनाते हैं। उनपर आपका…

बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा। न जाने क्यों नहीं लिखा। यूँ व्यस्तताएं काफी हैं पर इन व्यस्तताओं का तो बहाना है. आज से पहले भी थीं और शायद हमेशा रहेंगी ही. कुछ लोग टिक कर बैठ ही नहीं सकते। चक्कर होता है पैरों में चक्कर घिन्नी से डोलते ही रहते हैं. न मन को चैन, न दिमाग को, न ही पैरों को.…

हाँ मैंने देखा था उसे उस रोज़ जब पंचर हो गया था उसकी कार का पहिया घुटने मोड़े बैठा था गीली मिट्टी में जैक लिए हाथ में घूर रहा था पहिये को और फिर बीच बीच में आसमान को शायद वहीँ से कुछ मदद की आस में गंदे नहीं करने थे उसे अपने हाथ पर गालों पर लग चुकी थी ग्रीस जतन में…

अधिकार हमने ले लिए सम्मान अभी बाकी है। बलिदान बहुत कर लिए, अभिमान अभी बाकी है। फर्लांग देहरी दिए बढ़ा, आसमाँ पे अपने कदम। खोल मन की सांकले, निकास अभी बाकी है। रूढ़ियों के घुप्प अंधेरे चीर बनकर ‘शिखा’ स्त्रीत्व से चमकता, स्वाभिमान अभी बाकी है।…

तू शिव है मैं शक्ति नहीं तू सत्य है मैं असत्य सही तू सुन्दर है मैं असुंदर वही पर कुछ है जो भीतर है गुनता है पर दिखता नहीं तूने कभी पूछा नहीं मैंने भी तो कहा नहीं कदाचित प्रेम है तभी तुलता नहीं।…

लो फिर आ गया वह दिन. अब तो आदत सी बन गई है इस दिन लिखने की. बेशक पूरा साल कुछ न लिखा जाए पर यह दिन कुछ न कुछ लिखा ही ले जाता है. आप का ही असर है सब. मुझे याद है स्कूल में एक भाषण प्रतियोगिता थी. मैंने पहली बार अपनी टीचर के उकसाने पर भाग ले…

कल रात बिस्तर पर जल्दी चली गई थी. पड़ते ही आँख लग गई मगर थोड़ी देर में ही तेज तूफानी आवाजों से अचानक नींद खुल गई. डबल ग्लेज शीशों के बावजूद हवाओं का भाएँ भाएँ शोर घर के अंदर तक आ रहा था. बीच बीच में आवाज इतनी भयंकर होती कि लगता खिड़कियाँ तोड़ कर तूफ़ान कमरे में फ़ैल जाएगा.…

कभी यूँ भी तो हो कि हम तुम मिलें और कोई काम की बात न हो. बेशक तुम लो चाय, मैं कॉफ़ी, और बस मुस्कुराहट हो. हों बहाने, शिकायतें, मशवरें, बस न हो कोई भी मकसद. मुफलिसी हो, मशक्कत हो, या फिर हो मशरूफ़ियत. आएं, बैठें, बोलें – बतियाएं, पर ज़हन में कोई उम्मीद न हो. हाँ कभी यूँ भी…

निशा नहीं शत्रु, बस सुलाने आती है, चली जाएगी हो कितना भी गहन अन्धेरा, उषा अपनी राह बनाएगी समय की डोर थाम तू, मन छोड़ दे बहती हवा में वायुवेग के संग सुगंध फिर, तेरा जी महकाएगी. कार्य नियत उसे उतना ही, है जितनी सामर्थ्य जिसकी गांडीव मिला अर्जुन को ही, बने कृष्ण उसके ही सारथी हर एक का जन्म…