लोकप्रिय प्रविष्टियां

सामने मेज पर  क्रिस्टल के कटोरे में रखीं  गुलाब की सूखी पंखुड़ियाँ  एक बड़ा कप काली कॉफी  और पल पल गहराती यह रात अजीब सा हाल है.  शब्द अंगड़ाई ले,  उठने को बेताब हैं  और पलकें झुकी जा रही हैं. *************** अरे बरसना है तो ज़रा खुल के बरसो किसी के सच्चे प्यार की तरह ये क्या बूँद बूँद बरसते हो…

कुछ दिन पहले अनिल जनविजय जी की फेस बुक दिवार पर एसेनिन सर्गेई की यह कविता  .Я помню, любимая, помню (रूसी भाषा में ) देखि. उन्हें पहले थोडा बहुत पढ़ा तो था परन्तु समय के साथ रूसी भी कुछ पीछे छूट गई. यह कविता देख फिर एक बार रूसी भाषा से अपने टूटे तारों को जोड़ने का मन हुआ.अत:  मैंने इसका…

मुझसे एक बार जिंदगी ने  कहा था पास बैठाकर। चुपके से थाम हाथ मेरा  समझाया था दुलारकर। सुन ले अपने मन की,  उठा झोला और निकल पड़।   डाल पैरों में चप्पल  और न कोई फिकर कर।    छोटी हैं पगडंडियां, पथरीले हैं रास्ते, पर पुरसुकून है सफ़र. मान ले खुदा के वास्ते। और मंजिल ? पूछा मैंने तुनक कर.  उसका…

बंद खिड़की के शीशों से  झांकती एक पेड़ की शाखाएं  लदी – फदी हरे पत्तों से  हर हवा के झोंके के साथ  फैला देतीं हैं अपनी बाहें  चाहती है खोल दूं मैं खिड़की आ जाएँ वो भीतर  लुभाती तो मुझे भी है  वो सर्द सी ताज़ी हवा  वो घनेरी छाँव  पर मैं नहीं खोलती खिड़की  नहीं आने देती उसे अन्दर शायद…

सुबह की धुंध में  उनीदीं आँखों से देखने की कोशिश में सिहराती हवा में, शीत में बरसते हो, बर्फीली ज्यूँ घटा से. लिहाफों में जा दुबकी है मूंगफली की खुशबू. आलू के परांठे पे गुड़ मिर्ची करते गुफ्तगू. लेकर अंगडाई क्या मस्ताते हो हाय दिसंबर तुम बहुत प्यारे हो.…

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